भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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३३० मयमतम् अधिष्ठान, आकार, प्रपा (निर्मिति विशेष), मध्यम रङ्ग, अलङ्कार, स्तम्भों के पक्ष (स्तम्भों की योजना) एवं उनकी आकृति—इन सभी का वर्णन अब मैं (मय ऋषि) करता हूँ।।११-१२।। ☀ भक्तिमानम् ☀ सार्धहस्तं समारभ्य षट्षडङ्गुलवर्धनात् । पञ्चहस्तावधिर्यावत् त्रिः पञ्चैवाङ्घ्रिकान्तकम् ।।१३।। अथ विस्तारभक्त्यैषामायामं प्रविधास्यते । एकद्वित्रिचतुष्पञ्चभागे भक्त्यन्तरे कृते ।।१४।। एकभागेन वृद्धिः स्यादायामं स्वविशालतः । अथ स्वभक्तिविस्तृतात्रिमात्रङ्कर्या करान्ततः ।।१५।। आयाममष्टधा प्रोक्तं तेन मानेन योजयेत् । सायतं चापि तत् सर्वं तन्नाम्नैव प्रपद्यते ।।१६।। भक्ति का प्रमाण, प्रमाणयोजना—डेढ़ हाथ से प्रारम्भ कर छः-छः अंगुल बढ़ाते हुये पाँच हाथ तक पन्द्रह प्रकार के स्तम्भ-मान प्राप्त होते हैं। इसकी लम्बाई का मान चौड़ाई के भक्तिमान से ग्रहण किया जाता है। चौड़ाई से ग्रहण किये गये लम्बाई के मान के लिये चौड़ाई को एक, दो, तीन, चार या पाँच भाग में बाँटना चाहिये एवं लम्बाई को एक भाग अधिक होना चाहिये। अपने विस्तार के भक्तिमान से तीन-तीन अंगुल बढ़ाते हुये एक हाथ तक ले जाना चाहिये। इस प्रकार लम्बाई के आठ प्रमाण प्राप्त होते हैं। इससे प्रमाणयोजना बनानी चाहिये तथा सभी लम्बे मण्डप इसी भक्तिमान से निर्मित होने चाहिये।।१३-१६।। ☀ स्तम्भमानम् ☀ सार्धद्विहस्तमारभ्य षट्षडङ्गुलवर्धनात् । अष्टहस्तान्तमङ्घ्युच्चं त्रयोविंशत्प्रमाणकम् ।।१७।। त्रित्र्यङ्गुलविवृद्ध्या वा स्तम्भोत्सेधः प्रकीर्तिताः। स्तम्भ-प्रमाण—ढाई हाथ से प्रारम्भ कर छः-छः अंगुल बढ़ाते हुये आठ हाथ तक स्तम्भ की ऊँचाई ले जानी चाहिये। इस प्रकार स्तम्भ के तेईस प्रमाण बनते हैं। अथवा तीन-तीन अंगुल बढ़ाते हुये स्तम्भ का मान प्राप्त होता है।।१७।। अष्टाङ्गुलं समारभ्यैवार्धाङ्गुलवर्धनात् ।।१८।। नन्दपङ्क्त्यङ्गुलं यावत् संख्यया पूर्ववत्ततिः । पादोच्चैरपि रुद्रांशधर्मनन्दाष्टभाजिते ।।१९।।