मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चविंशोऽध्यायः 卐 मण्डपसभाविधानम् ३४५ मुखभाग नन्द विधि (श्लोक ८४-८५) के अनुसार भद्र (पोर्च) से युक्त होना चाहिये। भित्ति का निर्माण इच्छित दिशा में करना चाहिये। इसमें एक सौ चौरासी स्तम्भ एवं सभी प्रकार के अलंकरण होने चाहिये। यह मण्डप देव, ब्राह्मण एवं राजाओं के लिये उपयुक्त होता है।।९७-९८।। ✺ गर्भम् ✺ द्विःसप्तभक्तिविस्तारं समं तु चतुरस्रकम् ।।९९।। द्विभक्त्या गर्भकूटं स्यादेकांशालिन्द्रमावृतम् । एकांशमन्तरालं स्यादप्रच्छन्नतलान्वितम् ।।१००।। गर्भमण्डप—चौदह भाग विस्तार वाला यह मण्डप चौकोर होता है। दो भाग से गर्भकूट (मध्य भाग के ऊपर निर्मित कूट) होना चाहिये, जिसके चारो ओर एक भाग से अलिन्द्र (गलियारा) निर्मित हो। एक भाग से अन्तराल (मार्ग) निर्मित होना चाहिये, जिसके ऊपर छत न निर्मित हो।।९९-१००।। चतुष्कर्णे द्विभक्त्यैवमङ्गणं वोर्ध्वकूटकम् । द्विचतुर्विस्तृतायामं कोष्ठं वाङ्गणकं दिशि ।।१०१।। तेषां बाह्ये तु भागेन परितोऽलिन्द्रमिष्यते । चारो कोनों पर दो-दो भाग से आँगन निर्मित होने चाहिये, जिनके ऊपर ऊर्ध्वकूट हो सकते हैं (या आँगन खुले रह सकते हैं)। चारो दिशाओं में दो भाग चौड़े एवं तीन भाग लम्बे आँगन या तो कोष्ठ से युक्त (या बिना कोष्ठ के) होने चाहिये। उनके बाहर चारो ओर एक भाग से अलिन्द्र होना चाहिये।।१०१।। इष्टदिक्कुड्यसंयुक्तमिष्टदिग्भद्रसंयुतम् ।।१०२।। साष्टद्विशतपादं स्यादाद्यङ्गे तु विधीयते । देवद्विजनरेन्द्राणां गर्भाख्यं तन्मनोहरम् ।।१०३।। अभीष्ट दिशा में भित्ति हो एवं आठों दिशाओं में भद्र निर्मित होने चाहिये। अधिष्ठान पर दो सौ आठ स्तम्भ निर्मित होने चाहिये। गर्भसंज्ञक सुन्दर मण्डप देवों, ब्राह्मणों एवं राजाओं के अनुकूल होता है।।१०२-१०३।। ✺ माल्यम् ✺ त्रिःपञ्चभक्तिविस्तारं समं तु चतुरस्रकम् । त्रिभागं मध्यरङ्गच्यूर्ध्वकूटं वाङ्गणमेव वा ।।१०४।। परितोऽलिन्द्रमंशेन भागैकेनान्तरालकम् । शेषं पूर्ववदुद्दिष्टं कोष्ठकं भागतोऽधिकम् ।।१०५।।