भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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३४६ मयमतम् द्वात्रिंशद्विशतं पादमाद्यङ्गे प्रविधीयते। सर्वालङ्कारसंयुक्तं माल्याख्यं मण्डपं भवेत् ॥१०६॥ माल्य—इस मण्डप में पन्द्रह भाग विस्तृत चौकोर क्षेत्र होता है। इसके मध्य में तीन भाग से ऊर्ध्वकूट-युक्त मध्यरंग अथवा आँगन होना चाहिये। चारो ओर एक भाग से अलिन्द्र तथा एक भाग से अन्तराल होना चाहिये। शेष अंग पूर्ववर्णित होने चाहिये; किन्तु कोष्ठ एक भाग अधिक लम्बा होना चाहिये। अधिष्ठान पर दो सौ बत्तीस स्तम्भ होने चाहिये। सभी सज्जाओं से युक्त इस मण्डप की संज्ञा माल्य होती है। ✵ माल्याद्भुतम् ✵ माल्याद्भुतं समास्त्रं तु भागैः षोडशभिर्युतम् । द्विभक्त्यैवोर्ध्वकूटं तु भागेनालिन्द्रमावृतम् ॥१०७॥ द्व्येकभक्त्या मुखे भद्रं कर्णे लाङ्गलभित्तिकम् । पार्श्वे सोपानसंयुक्तं चित्रप्रस्तरसंयुक्तम् ॥१०८॥ माल्याद्भुत — माल्याद्भुत मण्डप सोलह भागों के सम-चतुष्कोण क्षेत्र से युक्त होता है। दो भाग से ऊर्ध्वकूट होता है एवं एक भाग माप के अलिन्द्र से घिरा होता है। सामने दो भाग एवं एक भाग माप का भद्र होता है एवं कोने में लाङ्गल के आकार की भित्ति होती है। पार्श्व में सीढ़ी निर्मित होती है एवं यह चित्र-प्रस्तर से युक्त होता है।।१०७-१०८।। तद्वहिर्द्व्यंशमानेन जलपादं समन्ततः । तद्वाह्ये तु चतुर्भक्त्या परितो मण्डपं भवेत् ॥१०९॥ द्विभक्तिचतुरस्त्राभमेकांशं व्यवधानकम् । द्विरष्टाङ्गणतन्मध्ये परितः प्रविधीयते ॥११०॥ उसके बाहर दो भाग के प्रमाण से चारो ओर जलपाद ( जलस्थान ) होना चाहिये तथा उसके बाहर चारो ओर चार भाग माप का मण्डप होना चाहिये। दो भाग का चौकोर क्षेत्र हो एवं एक भाग से व्यवधान ( अन्तराल ) निर्मित हो। उसके मध्य में चारो ओर सोलह भागों वाला आँगन होना चाहिये ।।१०९-११०।। कर्णे लाङ्गलकुड्यं स्यादूर्ध्वं हाराभिमण्डितम् । चतुर्द्विभक्तिविस्तारनिर्गमं दिक्षु भद्रकम् ॥१११॥ पार्श्वे सोपानसंयुक्तं सर्वालङ्कारसंयुक्तम् । देवद्विजनरेन्द्राणां चतुरस्रं द्विरष्टधा ॥११२॥