मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चविंशोऽध्यायः 卐 मण्डपसभाविधानम् ३४७ कोनों पर लाङ्गल के आकार की भित्ति हो एवं ऊर्ध्व भाग पर हारामार्ग से अलंकरण हों। दो भाग विस्तृत क्षेत्र निर्गम से युक्त हो एवं चारो दिशाओं में भद्र निर्मित हों। पार्श्व में सीढ़ी हो एवं सभी प्रकार के आभरणों से युक्त हो। ये सोलह प्रकार के चौकोर मण्डप देवों, ब्राह्मणों एवं राजाओं के लिये उपयुक्त होते हैं।।१११-११२।। इत ऊर्ध्वं द्विपाश्र्वैकवृद्ध्या द्वात्रिंशदंशकम् । विस्तारं चतुरस्राभं मण्डपं कारयेद् बुधः ।।११३।। विवृतं संवृतं वापि कुड्यस्तम्भं प्रयोजयेत् । यथायुक्ति यथाशोभं तथा कुर्याद् विचक्षणः ।।११४।। एतेषामायतास्राभं मण्डपं प्रविधीयते । बुद्धिमान व्यक्ति ( स्थपति ) को उपर्युक्त चतुष्कोण मण्डपों में प्रत्येक में पाश्र्वों में एक-एक भाग बढ़ाते हुये बत्तीस भाग तक विस्तार ले जाना चाहिये। ये मण्डप खुले या बन्द हो सकते हैं एवं आवश्यकतानुसार भित्ति एवं स्तम्भ निर्मित किये जाने चाहिये। बुद्धिमान व्यक्ति को यथावसर एवं शोभा के अनुकूल मण्डप-निर्माण करना चाहिये। आयताकार मण्डपों का वर्णन इस प्रकार किया गया।।११३-११४।। ✺ धनम् ✺ त्रिभक्तिविस्तृतं तस्माद् द्विभक्त्याधिकमायतम् ।।११५।। पुरतो वारमेकांशं त्रिरष्टाङ्घ्रिसमन्वितम् । विंशन्नास्यङ्गसंयुक्तं धनाख्यं तद्धनावहम् ।।११६।। धन—यह मण्डप तीन भाग चौड़ा एवं लम्बाई में दो भाग अधिक होता है। सामने एक भाग से वार ( प्रवेश ) होता है एवं यह चौबीस स्तम्भों से युक्त होता है। इसमें बीस नासियाँ होती हैं। धन प्रदान करने वाला यह मण्डप धनसंज्ञक होता है।।११५-११६।। ✺ सुभूषणम् ✺ विस्तारं चतुरंशैस्तु तस्माद् द्व्यंशाधिकायतम् । मण्डपं परितो भक्त्या शेषमङ्गणकं भवेत् ।।११७।। द्विभक्तिविस्तृतं चैकभक्त्या तन्मुखभद्रकम् । चतुरष्टाङ्घ्रिसंयुक्तमाद्यङ्गेषु बहिर्बहिः ।।११८।। सर्वालङ्कारसंयुक्तं सुभूषणमिति स्मृतम् । सुभूषण—इसका विस्तार चार भागों से एवं लम्बाई उससे दो भाग अधिक