मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
DevanagariHindipublished395 पृष्ठ
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३४८ मयमतम् रक्खा जाता है। एक भाग से चारो ओर मण्डप एवं शेष भाग से आँगन निर्मित करना चाहिये। मुख-भद्रक ( सामने बना पोर्च ) दो भाग विस्तृत एवं एक भाग ( आगे निकला भाग ) माप का होना चाहिये। अधिष्ठान पर बाहरी भाग में बत्तीस स्तम्भ होने चाहिये। सभी अलंकरणों से युक्त इस मण्डप का नाम सुभूषण होता है।
- आहल्पम् * पञ्चरक्त्या विशालं तु तस्माद् द्व्यंशाधिकायतम् ।। ११९ ।। मण्डपं परितोऽशेन शेषं कूटं तु वाऽङ्गणम्। त्रिभक्तिविस्तृतं चैकभक्त्या तन्मुखभद्रकम् ।। १२० ।। आद्यङ्गमष्टपञ्चाङ्घ्रिसंयुक्तं तद् विचित्रकम्। सर्वालङ्कारसंयुक्तमाहल्यं सर्वदेशिकम् ।। १२१ ।। आहल्य—इस मण्डप की चौड़ाई पाँच भाग एवं लम्बाई उससे दो भाग अधिक होती है। चारो ओर मण्डप एक भाग से एवं शेष भाग से कूट निर्मित करे या ( खुला ) आँगन छोड़ देना चाहिये। तीन भाग विस्तार वाला एक भाग का मुखभद्र निर्मित करना चाहिये। अधिष्ठान चालीस स्तम्भों से युक्त होना चाहिये। विचित्र एवं सभी अलंकारों से युक्त आहल्य संज्ञक मण्डप सभी स्थानों के लिये उपयुक्त होता है।। ११९-१२१ ।।
- स्रुगाख्यम् * षड्भक्तिविस्तृतं तस्माद् द्विभक्त्याधिकमायतम्। चतुर्द्विभक्तिकं दैर्घ्यव्यासमध्ये सभोदयम् ।। १२२ ।। परितो मण्डपं द्व्यंशमिष्टदिङ्मुखभद्रकम्। षष्ट्यङ्घ्रियुतमाद्यङ्गं युक्त्या नास्यङ्गसंयुक्तम् ।। १२३ ।। सर्वालङ्कारसंयुक्तं स्रुगाख्यं तन्मनोहरम्। स्रुग मण्डप—यह मण्डप छः भाग विस्तृत होता है एवं इसकी लम्बाई चौड़ाई से दो भाग अधिक होती है। मध्य भाग में चार भाग लम्बा एवं दो भाग चौड़ा सभागार होता है, जिसके चारो ओर मण्डप होता है। दो भाग से मुखभद्र का निर्माण इच्छानुसार किसी भी दिशा में किया जा सकता है। अधिष्ठान साठ स्तम्भों से युक्त होता है तथा नासियाँ निर्मित होती हैं। सभी आभरणों से सुसज्जित एवं मनोहर इस मण्डप की संज्ञा स्रुग है।। १२२-१२३ ।।
- कोणम् * सप्तभक्त्या विशालं तु तस्माद् द्व्यंशाधिकायतम ।। १२४ ।।