भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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पञ्चविंशोऽध्यायः 卐 मण्डपसभाविधानम् ३४९ त्रिभक्तिविस्तृतं पञ्चभक्तिदैर्घ्यं सभाङ्गणम्। परितो मण्डपं द्व्यंशमिष्टदिग्गतभित्तिकम् ॥१२५॥ त्रिभक्तिविस्तृतं भागनिर्गमं मुखभद्रकम्। युक्त्या नास्यङ्गसंयुक्तं द्विसप्तत्यङ्घ्रिकान्वितम् ॥१२६॥ सर्वालङ्कारसंयुक्तं कोणाख्यं मण्डपं भवेत्। कोण—यह मण्डप सात भाग विस्तृत एवं लम्बाई में चौड़ाई से दो भाग अधिक होता है। तीन भाग चौड़ा एवं पाँच भाग लम्बा इसका सभाङ्गण होता है। इसके चारो ओर मण्डप दो भाग से निर्मित होता है एवं इच्छानुसार दिशा में भित्ति निर्मित की जा सकती है। मुखभद्र तीन भाग चौड़ा एवं एक भाग निर्गम से युक्त होता है। यह आवश्यकतानुसार नासियों से युक्त होता है एवं इसका अधिष्ठान बहत्तर स्तम्भों से युक्त होता है। कोणसंज्ञक यह मण्डप सभी अलंकरणों से सुसज्जित होता है। ✺ खर्वटम् ✺ अष्टभक्त्या विशालं तु तस्माद् द्व्यंशाधिकायतम् ॥१२७॥ द्विचतुर्भागविस्तारायामं मध्ये जलस्थलम्। परितोऽलिन्द्रमेकांशं बाह्ये द्व्यंशेन मण्डपम् ॥१२८॥ खर्वट—इस मण्डप की चौड़ाई आठ भाग एवं लम्बाई उससे दो भाग अधिक होती है। मध्य भाग में दो भाग चौड़ा एवं चार भाग लम्बा जल-स्थान होना चाहिये। चारो ओर एक भाग से अलिन्द्र एवं उसके बाहर दो भाग से मण्डप होना चाहिये। त्यक्तमध्याङ्घ्रिसंयुक्तमिष्टदिग्गतभित्तिकम् । साष्टषष्ट्यङ्घ्रिसंयुक्तं पूर्ववन्मुखभद्रकम् ॥१२९॥ प्रमुखे वारमेकांशं मुखं सोपानसंयुक्तम्। नानालङ्कारसंयुक्तं सुरादीनां तु खर्वटम् ॥१३०॥ उसके मध्य भाग में स्तम्भ नहीं होना चाहिये। अभीप्सित दिशा में भित्ति होनी चाहिये। पहले के समान अड़सठ स्तम्भ एवं मुख-भद्र होना चाहिये। मुखभाग पर एक भाग से प्रवेश एवं मुखभाग सीढ़ियों से युक्त होना चाहिये। विभिन्न अलंकारों से सुसज्जित खर्वटसंज्ञक यह मण्डप देवों आदि के लिये प्रशस्त होता है। ✺ श्रीरूपम् ✺ नवभक्तिविशालं तु तस्माद् द्व्यंशाधिकायतम्। एकत्र्यंशं तु विस्तारायामं मध्ये जलस्थलम् ॥१३१॥