मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३५० मयमतम् परितोऽलिन्द्रमेकांशं बाह्ये द्व्यंशेन मण्डपम् । त्यक्तमध्याङ्घ्रिसंयुक्तं बाह्ये वारं तु भागतः ॥१३२॥ श्रीरूप—यह मण्डप नौ भाग विस्तृत होता है एवं इसकी लम्बाई चौड़ाई से दो भाग अधिक होती है। चारो ओर एक भाग से अलिन्द्र एवं उसके बाहर दो भाग से मण्डप होता है। मध्य भाग में स्तम्भ नहीं होता है तथा बाहर की ओर एक भाग से मार्ग होता है॥१३१-१३२॥ षण्णवत्यङ्घ्रिसंयुक्तं यथेष्टं द्वारभित्तिकम् । वारयुक्तमवारं वा पूर्ववन्मुखभद्रकम् ॥१३३॥ नानावयवसंयुक्तं नाम्ना श्रीरूपमिष्यते । इसमें उनहत्तर स्तम्भ होते हैं तथा इच्छित दिशा में द्वार एवं भित्ति का निर्माण किया जाता है। पूर्ववर्णित रीति से मुखभद्र होता है, जो मार्ग से युक्त या उसके बिना होता है। विभिन्न अंगों से युक्त इस मण्डप को श्रीरूप कहते हैं॥१३३॥ ✺ मङ्गलम् ✺ पङ्क्तिभागविशालं तु तस्माद् द्व्यंशाधिकायतम् ॥१३४॥ द्विचतुर्भागविस्तारायामं मध्ये सभोदयम् । परितोऽलिन्द्रमेकांशं भागेन जलपातनम् ॥१३५॥ मङ्गल—यह मण्डप दस भाग चौड़ा एवं लम्बाई उससे दो भाग अधिक होती है। मध्य भाग में दो भाग चौड़ा एवं चार भाग लम्बा सभागार होता है। चारो ओर एक भाग से अलिन्द्र एवं एक भाग से जल-स्थान होता है॥१३४-१३५॥ तद्बाह्ये द्व्यंशमानेन परितो मण्डपं भवेत् । स्तम्भं कुड्यं मुखं भद्रं यथेष्टं परिकल्पयेत् ॥१३६॥ अथवा मध्यकूटं चाप्यलिन्द्रं चापि पूर्ववत् । जलस्थलं विना सर्वं मण्डपं परिकल्पयेत् ॥१३७॥ उसके बाहर चारो ओर दो भाग से मण्डप होता है। स्तम्भ, भित्ति, मुखभद्र आदि का निर्माण इच्छानुसार किया जाता है। अथवा मध्यकूट एवं अलिन्द्र पहले के सदृश निर्मित करना चाहिये। सभी मण्डपों को जल-स्थान के बिना ही निर्मित करना चाहिये। द्विभक्त्या चतुरस्रं तु षट्कूटं पार्श्वयोर्मतम् । द्विचतुर्भागविस्तारदैर्घ्यं कोष्ठं मुखेऽमुखे ॥१३८॥ कर्णे लाङ्गलकुड्यं वा परितः कुड्यमेव वा । विवृतं संवृतं वाऽपि स्तम्भं तत्रैव योजयेत् ॥१३९॥