भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

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पञ्चविंशोऽध्यायः 卐 मण्डपसभाविधानम् ३५१ दोनों पाश्र्वों में दो भाग से चौकोर छः कूटों का निर्माण करना चाहिये। सामने एवं पीछे दो भाग चौड़ा एवं चार भाग लम्बा कोष्ठ निर्मित करना चाहिये। कोनों पर लाङ्गल-भित्ति तथा चारो ओर भित्ति निर्मित करनी चाहिये या भित्ति नहीं भी हो सकती है। यह खुला अथवा ढँका हो सकता है। वहीं स्तम्भ का निर्माण करना चाहिये। सर्वावयवसंयुक्तं मङ्गलाख्यं तु मण्डपम्। अष्टावेतानि चोक्तानि देवद्विजमहीभृताम् ॥१४०॥ सभी अंगों से युक्त इस मण्डप की संज्ञा मङ्गल है। आठ चतुष्कोण से युक्त ये ( आयताकार ) मण्डप देवों, ब्राह्मणों एवं राजाओं के लिये कहे गये हैं॥१४०॥ पूर्वोक्तचतुरस्रात्तु भक्त्यैकया विवर्धनात्। यावद् द्विगुणमायामं तावद् दैर्घ्यं प्रयोजयेत् ॥१४१॥ स्तम्भकुड्यादिकं सर्वमलङ्कारं च तत्ततः। यथारुचि यथाशोभं तथा कुर्याद् विचक्षणः ॥१४२॥ अष्टावायतयुक्तानि वक्ष्यन्ते वैश्यशूद्रयोः। पूर्वोक्त चतुष्कोण ( आयताकार ) मण्डपों में चौड़ाई में एक-एक भाग बढ़ाते हुये वहाँ तक लम्बाई का माप रखना चाहिये, जब तक लम्बाई चौड़ाई की दुगुनी न हो जाय। बुद्धिमान स्थपति को मण्डप में स्तम्भ एवं भित्ति आदि सभी अलंकरणों का इच्छानुसार एवं जिस प्रकार सुन्दर लगे, उस प्रकार निर्माण करना चाहिये। अब वैश्य एवं शूद्रों के अनुकूल आठ आयताकार मण्डपों का वर्णन किया जा रहा है। ✺ मार्गम् ✺ द्विभक्तिविस्तृतं चैव विस्तारद्विगुणायतम् ॥१४३॥ त्रिःपञ्चाङ्घ्रिसमायुक्तं द्व्यंशैकं मुखभद्रकम्। पाश्र्वे सोपानसंयुक्तं नासिकाख्यैरलङ्कृतम् ॥१४४॥ इष्टदिङ्मुखसंयुक्तं मार्गाख्यं मण्डपं मतम्। मार्ग—इस मण्डप का विस्तार दो भाग एवं लम्बाई विस्तार की दुगुनी होनी चाहिये। इसमें पन्द्रह स्तम्भ हों एवं दो भाग ( चौड़ा ) एवं एक भाग ( बाहर की ओर निकला ) मुखभद्रक ( पोर्च ) होना चाहिये। इसका सोपान पार्श्व में निर्मित होना चाहिये तथा नासिकाओं से यह सुशोभित होना चाहिये। इसका मुख-भाग इच्छित दिशा में रखना चाहिये। इसे मार्ग संज्ञक मण्डप कहते हैं॥१४३-१४४॥ ✺ सौभद्रम् ✺ त्रिभक्तिविस्तृतं तस्य विस्तारद्विगुणायतम् ॥१४५॥