भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

पृष्ठ 376, कुल 395 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 376

३५२ मयमतम् चतुःसप्ताङ्घ्रिसंयुक्तं भक्त्या वारं तु तन्मुखे। द्विभक्तिविस्तृतं भक्त्या निर्गमं मुखभद्रकम् ॥१४६॥ युक्त्या नास्यङ्घ्रिसंयुक्तं सौभद्रं तन्मनोहरम्। सौभद्र—सौभद्र मण्डप का विस्तार तीन भाग एवं लम्बाई विस्तार की दुगुनी होती है। यह अट्ठाईस स्तम्भों से युक्त होता है एवं सामने एक भाग से वार (मार्ग) होता है। मुख-भद्रक का विस्तार दो भाग एवं निर्गम (सामने निकला भाग) एक भाग से निर्मित होता है। उचित रीति से नासियों एवं स्तम्भों से युक्त यह सुन्दर मण्डप सौभद्र संज्ञक होता है॥१४५-१४६॥ ✵ सुन्दरम् ✵ चतुर्भक्त्या विशालं तु तस्माद् द्व्यंशाधिकायतम् ॥१४७॥ द्विचतुर्विस्तृतायामं कूटं मध्ये तु वाऽङ्गणम्। द्वात्रिंशाङ्घ्रिसमायुक्तं भक्त्या तन्मुखभद्रकम् ॥१४८॥ युक्त्या नास्यङ्घ्रिसंयुक्तं सुन्दराख्यं तु मण्डपम्। सुन्दर—इस मण्डप की चौड़ाई चार भाग एवं लम्बाई उसकी दुगुनी होती है। मध्य भाग दो भाग चौड़ा एवं चार भाग लम्बा होता है, जिस पर कूट निर्मित होता है अथवा वहाँ (खुला हुआ) आँगन होता है। बत्तीस स्तम्भों से युक्त इस मण्डप में एक भाग से मुख-भद्रक निर्मित होता है। सुन्दर नामक यह मण्डप आवश्यकतानुसार नासियों एवं स्तम्भों से युक्त होता है॥१४७-१४८॥ ✵ साधारणम् ✵ पञ्चभक्त्या विशालं तु तस्माद् वेदांशमायतम् ॥१४९॥ द्विभक्तिविस्तृतं त्र्यंशदैर्घ्यं पार्श्वेऽङ्गणद्वयम्। षट्पञ्चाशद् भवेत् पादं वारमेकेन तन्मुखे ॥१५०॥ त्रिभक्तिविस्तृतं चैकभक्त्या तन्मुखभद्रकम्। प्रमुखे तस्य सोपानं सर्वतः कुड्यसंयुतम् ॥१५१॥ युक्त्या नास्यङ्गसंयुक्तं साधारणमिति स्मृतम्। साधारण—यह मण्डप पाँच भाग विस्तृत एवं लम्बाई में चौड़ाई से चार भाग अधिक होता है। बगल में दो भाग चौड़े एवं तीन भाग लम्बे दो आँगन होते हैं। इसमें छप्पन खम्भे होते हैं एवं सामने एक भाग से वार निर्मित होता है। तीन भाग विस्तृत एवं एक भाग (बाहर निकला) माप से मुख-भद्रक का निर्माण करना चाहिये। मुख