मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चविंशोऽध्यायः 卐 मण्डपसभाविधानम् ३५३ भाग पर सोपान एवं चारो ओर भित्ति होनी चाहिये। आवश्यकतानुसार नासी आदि अंगों से युक्त इस मण्डप को साधारण कहते हैं।।१४९-१५१।। ✺ सौख्यम् ✺ षड्भक्तिविस्तृतं तस्मात् त्रिभक्त्याधिकमायतम् ॥१५२॥ द्विपञ्चभागविस्तारायामं मध्ये सभोदयम्। परितो मण्डपं द्व्यंशं वारं भक्त्या तु तन्मुखे ॥१५३॥ पूर्ववन्मुखभद्रं तु नासिकाख्यैरलङ्कृतम्। षष्ट्यङ्घ्रिकसमायुक्तं सर्वावयवसंयुक्तम् ॥१५४॥ नाम्ना सौख्यमिति प्रोक्तं सर्वेषां तु सनातनम्। सौख्य—यह छः भाग चौड़ा एवं चौड़ाई से तीन भाग अधिक लम्बा होता है। मध्य भाग में दो भाग चौड़ा एवं पाँच भाग लम्बा सभागार होता है। चारो ओर दो भाग से मण्डप एवं सामने एक भाग से वार निर्मित होता है। पहले के समान मुख-भद्रक निर्मित होता है एवं नासिकाओं से सुसज्जित होता है। साठ स्तम्भों से एवं सभी अंगों से युक्त इस मण्डप की संज्ञा सौख्य है। यह सभी लोगों के लिये अनुकूल होता है।।१५२-१५४।। ✺ ईश्वरकान्तम् ✺ सप्तभक्त्या विशालं तु तस्माद् वेदांशमायतम् ॥१५५॥ त्रिभागचतुरस्रं तु मध्ये कूटं तु वाऽङ्गणम्। तद्बाह्ये भागमानेन परितोऽलिन्द्रमिष्यते ॥१५६॥ द्विपञ्चविस्तृतायामं पार्श्वयोरङ्गणद्वयम्। बाह्ये मण्डपमेकांशं परितः कल्पयेद् बुधः ॥१५७॥ ईश्वरकान्त—इस मण्डप की चौड़ाई सात भाग से एवं लम्बाई उससे चार भाग अधिक होती है। मध्य भाग में तीन भाग का चौकोर क्षेत्र होता है, जिस पर कूट निर्मित होता है अथवा वहाँ ( खुला ) आँगन होता है। उसके बाहर एक भाग प्रमाण से चारो ओर अलिन्द्र होता है। दोनों पार्श्वों में दो भाग चौड़े एवं पाँच भाग लम्बे दो आँगन होते हैं। उसके बाहर एक भाग से चारो ओर मण्डप निर्मित होता है, ऐसा विद्वानों का मत है।।१५५-१५७।। त्रिभक्त्यैकेन विस्तारनिर्गमं मुखभद्रकम्। चतुराशीतिकं पादमाद्यङ्गे प्रविधीयते ॥१५८॥ मय०-२३