भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

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३५४ मयमतम् प्रमुखे वारमेकांशं नानावयवशोभितम्। सर्वलङ्कारसंयुक्तमेतदीश्वरकान्तकम् ॥१५९॥ तीन भाग चौड़ा एवं एक भाग बाहर निकला मुख-भद्रक निर्मित होता है। अधिष्ठान पर चौरासी स्तम्भ निर्मित होते हैं। मुखभाग पर एक भाग से वार निर्मित होता है। यह ईश्वरकान्त मण्डप विभिन्न अंगों से सुशोभित एवं सभी अलंकरणों से युक्त होता है।।१५८-१५९।। ❋ श्रीभद्रम् ❋ अष्टभक्त्या विशालं तु तस्मात् पूर्ववदायतम् । द्विभक्ति चतुरस्रं तु मध्ये कूटं तु वाङ्गणम्॥१६०॥ तद्बाह्ये भागमानेन परितोऽलिन्द्रमिष्यते। पूर्ववत् पार्श्वयोः कूटं द्वयंशेनाधिकमायतम्॥१६१॥ श्रीभद्र—यह मण्डप आठ भाग चौड़ा तथा पूर्ववर्णित माप के अनुसार लम्बा होता है। मध्य भाग दो भाग माप का चौकोर क्षेत्र होता है, जिसमें कूट निर्मित होता है या आँगन होता है। उसके बाहर एक भाग के प्रमाण से चारो ओर अलिन्द्र निर्मित होता है। दोनों पार्श्वों में पहले के समान कूट होते हैं, जिन्हें पूर्ववर्णित मान से दो भाग अधिक लम्बा रक्खा जाता है।।१६०-१६१।। द्विभक्त्या मण्डपं बाह्ये परितः कल्पयेद् बुधः। चतुर्द्विभक्तिविस्तारनिर्गमं मुखभद्रकम्॥१६२॥ दशाधिकशतस्तम्भमाद्यङ्गे प्रविधीयते । सर्वलङ्कारसंयुक्तं श्रीभद्रं सर्वयोग्यकम् ॥१६३॥ उसके बाहर चारो ओर दो भाग से बुद्धिमान स्थपति को मण्डप निर्मित करना चाहिये। चार भाग चौड़ा एवं दो भाग बाहर निकला मुखभद्रक निर्मित करना चाहिये। अधिष्ठान पर एक सौ दस स्तम्भ निर्मित करना चाहिये। सभी अलंकरणों से युक्त यह श्रीभद्र मण्डप सभी के लिये अनुकूल होता है।।१६२-१६३।। ❋ सर्वतोभद्रम् ❋ नवभक्त्या विशालं तु तस्मात् पूर्ववदायतम् । त्रिभक्तिचतुरस्रं तु मध्ये कूटं तु वाङ्गणम्॥१६४॥ तद्बाह्ये भागमानेन परितोऽलिन्द्रमिष्यते। द्विपञ्चभक्तिविस्तारदैर्घ्यं पार्श्वेऽङ्गणद्वयम्॥१६५॥