मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चविंशोऽध्यायः 卐 मण्डपसभाविधानम् ३५५ परितो मण्डपं द्व्यंशं तद्बाह्ये योजयेद्बुधः । पञ्चद्व्यंशविशालायामेन भद्रं मुखेऽमुखे ॥१६६॥ सर्वतोभद्र—इस मण्डप को नौ भाग विस्तृत एवं लम्बाई पहले दिये गये माप के अनुसार होना चाहिये। तीन भाग चौड़ाई वाले मध्य भाग में चौकोर क्षेत्र कूट से युक्त हो सकता है या वहाँ आँगन हो सकता है। उसके बाहर एक भाग प्रमाण से चारो ओर अलिन्द्र होना चाहिये। पार्श्व भाग में दो भाग चौड़ा एवं पाँच भाग लम्बा दो आँगन होना चाहिये। चारो ओर उसके बाहर दो भाग से बुद्धिमान व्यक्ति को मण्डप बनाना चाहिये। सामने एवं पीछे पाँच भाग चौड़े एवं दो भाग लम्बे ( गहरे ) भद्र ( पोर्च ) होने चाहिये।।१६४-१६६।। त्र्यंशैकविपुलं दैर्घ्यं पार्श्वयोर्भद्रकद्वयम् । कर्णे लाङ्गलवत् कुड्यं विवृतस्तम्भसंयुतम् ॥१६७॥ साष्टाविंशच्छतं पादमाद्यङ्गे प्रविधीयते । यथायुक्ति यथायोगं तथा युञ्जीत बुद्धिमान् ॥१६८॥ सर्वतोभद्रकं नाम्ना सर्वालङ्कारसंयुतम् । एतान्यदि सुरादीनां योजयेत्तु विचक्षणः ॥१६९॥ दोनों पार्श्वों में तीन भाग चौड़े एवं एक भाग लम्बे दो भद्रक होने चाहिये। कोनों पर लाङ्गल के समान भित्ति एवं स्तम्भ होने चाहिये। अधिष्ठान पर एक सौ अट्ठाईस स्तम्भ निर्मित होने चाहिये। अन्य अवयवों को आवश्यकतानुसार उचित रीति से बुद्धिमान् स्थपति को संयुक्त करना चाहिये। सर्वतोभद्र संज्ञक मण्डप सभी अलंकरणों से युक्त होता है। इस प्रकार बुद्धिमान व्यक्ति को इस मण्डप का निर्माण देवादिकों के भवन में करना चाहिये।।१६७-१६९।। ✵ मण्डपमुखायामः ✵ मण्डपानां तु विस्तारादायामं प्रविधीयते । जातिरूपं तु पूर्वोक्तं छन्दमेकं द्विभक्तिकम् ॥१७०॥ विकल्यं त्र्यंशकं प्रोक्तमाभासं चतुरस्रकम् । दण्डकं स्वस्तिभद्रं च पद्मं क्रकरभद्रकम् ॥१७१॥ षण्मुखं लाङ्गलं मौलिं जातिनामानुसारतः । प्रपामण्डपजातिस्तु युक्तितः पादसंयुता ॥१७२॥ मण्डप की लम्बाई—मण्डपों की लम्बाई का विधान उनकी चौड़ाई के अनुसार किया जाता है। जातिरूप का वर्णन पहले किया जा चुका है। छन्दरूप में लम्बाई