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मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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३५६ मयमतम् चौड़ाई से एक भाग अधिक होती है। विकल्प रीति में दो भाग एवं आभास रीति में तीन भाग अधिक लम्बाई रक्खी जाती है। चौकोर, दण्डक, स्वस्तिभद्र, पद्म, क्रकरभद्रक, षण्मुख, लाङ्गल तथा मौलि मण्डप जातिमान के अनुसार होते हैं। प्रपा एवं मण्डप जातिमान के अनुसार होते हैं तथा आवश्यकतानुसार इनमें स्तम्भों का निर्माण किया जाता है।।१७०-१७२।। ✺ पुनः मण्डपभेदाः ✺ गृहविन्यासरङ्गाङ्गं तदुक्तं गृहमण्डपम्। प्रासादगर्भनालीवत् सालिन्द्राङ्गविशेषतः ।।१७३।। अधिष्ठानादिवर्गाढ्यं प्रासादाकारमण्डपम् । प्रासादगृहसाङ्गाङ्गं गृहप्रासादमण्डपम् ।।१७४।। मण्डपों के अन्य भेद—गृहविन्यास के अंगभूत रङ्गस्थल को गृहमण्डप कहते हैं। जिस प्रकार प्रासाद में गर्भगृह होता है, उसी प्रकार गृह में मण्डप होता है जो विशेष रूप से अलिन्द्र से युक्त होता है। अधिष्ठान आदि से युक्त यह मण्डप देवालय के आकार का होता है। जिस गृहमण्डप में वे विशिष्ट अंग होते हैं, जो देवालय के मण्डप के अंग होते हैं, उसे गृहप्रासादमण्डप कहते हैं।।१७३-१७४।। मण्डपोपरि भूमिश्रेन्मालिकामण्डपं मतम्। इष्टकाभिः शिलाभिर्वा दारुभिर्दन्तलोहकैः। सर्वत्र द्रव्यजातीनां मिश्रं मिश्रं विशेषितम् ।।१७५।। यदि मण्डप के ऊपर तल निर्मित हो तो उसे मालिकामण्डप कहते हैं। यह मण्डप ईंटों, शिलाओं, काष्ठ, गजदन्त या धातुओं से निर्मित होता है। यह सभी प्रकार के मिश्रित द्रव्यों से निर्मित होता है।।१७५।। ✺ जलक्रीडामण्डपम् ✺ सायतं तु चतुरस्रकं जलक्रीडयान्वितमथापि मण्डपम्। एकभौमकमनेकभौमकं योजनीयमवनीपतीच्छया ।।१७६।। जलक्रीडा-मण्डप—राजा की इच्छा के अनुसार जल-क्रीडा से युक्त मण्डप चौकोर या आयताकार हो सकता है। इसमें एक या अनेक तल हो सकते हैं।।१७६।। संवृतं विवृतमङ्घ्रिभित्तिकं दिक्षु दिक्षु गतभद्ररूपकम् । मध्यरङ्गसहितं तु वाङ्गणे स्तम्भभित्तिकमुपर्यपर्यपि ।।१७७।। यह मण्डप खुला अथवा (भित्ति से) ढँका हो सकता है। यह अंघ्रि-भित्तियों (पंक्ति में निर्मित स्तम्भों) से घिरा होता है। दिशाओं में भद्र (पोर्च) निर्मित होते