भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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पञ्चविंशोऽध्यायः 卐 मण्डपसभाविधानम् ३५७ हैं। यह मध्य भाग में रङ्गसहित होता है अथवा वहाँ आँगन होता है। ऊपरी तल स्तम्भों अथवा भित्तियों से घिरा होता है।।१७७।। गुह्यवारणपराधिरोहणं द्वारि तत्र बहुयन्त्रकल्पकम्। वारिगर्भगजभूतहंसकं व्यालसिंहकपिसालभञ्जिकम् ॥१७८॥ इसकी सीढ़ी गुप्त द्वार के पीछे होती है, जिसके द्वार पर बहुत से यन्त्र निर्मित होते है। ये गज, भूत, हंस, व्याल, कपि एवं शालभञ्जिका ( पेड़ की शाख पकड़ कर तोड़ने की मुद्रा में स्त्री आकृति ) आदि के रूप में होते हैं, जिनके भीतर जल भरा होता है।।१७८।। हर्म्यमण्डपसभाभशीर्षकं कूटनीडगजतुण्डकोष्ठकम्। तोरणादिबहुजालकैर्युतं नासिकादिभिरलङ्कृतं पुनः ॥१७९॥ मण्डपस्य पुरतोऽथ मध्यमे वा जलाशयमेकयन्त्रकम्। इष्टकाभिरुपलैरलङ्कृतं सावगूढमपगूढवारिणाम् ॥१८०॥ मण्डप का शीर्ष भाग हर्म्य के शीर्ष भाग के समान या सभागार के शीर्ष भाग के समान होता है। यह कूट, नीड, गज-तुण्ड ( हाथी की सूँड ) एवं कोष्ठक से सुसज्जित होता है। यह तोरण आदि, अनेक जालकों ( झरोखों ) एवं नासिकाओं से अलंकृत होता है। मण्डप के सामने या मध्य भाग में अनेक यन्त्रों से युक्त जलाशय होता है, जो ईंटों या प्रस्तरों से सुसज्जित होता है। जल से युक्त यह जलाशय गुप्त होता है अथवा खुला होता है।।१७९-१८०।। एवं भूपानां जलक्रीडनार्थं प्रोक्तं यत्तन्मण्डपं रम्यदेशे। सालङ्कारं सर्वचित्रैर्विचित्रं स्त्रीसौभाग्यारोग्यभोग्यप्रदायि ॥१८१॥ इस प्रकार राजाओं के जल-क्रीडा के लिये जिस मण्डप का उल्लेख किया गया है, वह रमणीय स्थान में रहता है। यह अलंकारों से युक्त, विभिन्न प्रकार के चित्रों से युक्त, स्त्री, सौभाग्य, आरोग्य एवं भोग प्रदान करने वाला होता है।।१८१।। ✹ मण्डपयोग्यवृक्षाः ✹ खदिरः खादिरो वह्निर्निम्बः सालः सिलिन्द्रकः पिशितः। तिन्दुकमथ राजादनहोममधूकास्तु पादपादपकाः ॥१८२॥ एते देवद्विजनृपयोग्याः स्युः सर्वकर्मसु वै। स्तम्भाकृतयः सर्वे प्रोक्ताः पूर्वोदितास्तेषाम् ॥१८३॥ मण्डप के अनुकूल वृक्ष—खदिर, खादिर, वह्नि, निम्ब, साल, सिलिन्द्रक,