भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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३५८ मयमतम् पिशित, तिन्दुक, राजादन, होम एवं मधूक के वृक्ष ( के काष्ठ ) स्तम्भ-निर्माण के लिये अनुकूल होते हैं। ये वृक्ष देवों, ब्राह्मणों एवं राजाओं से सम्बद्ध सभी कार्यों के लिये प्रशस्त होते हैं। पूर्वोक्त सभी वृक्ष (काष्ठ ) सभी प्रकार के स्तम्भों के लिये उपयुक्त होते हैं।। १८२-१८३।। पिशितस्तिन्दुकवृक्षो निम्बो राजादनो मधूकश्च । सिलिन्द्रः स्तम्भरुजा वैश्यानां चापि शूद्राणाम् ॥१८४॥ वृत्तं वा चतुरस्रं वाष्टास्रं षोडशास्रं च । स्तम्भाकृतयः प्रोक्तास्त्वक्साराः सर्वयोग्याः स्युः ॥१८५॥ पिशित, तिन्दुक, निम्ब, राजादन, मधूक एवं सिलिन्द्र के वृक्ष से निर्मित स्तम्भ वैश्यों एवं शूद्रों के लिये होते हैं। स्तम्भों की आकृतियाँ वृत्ताकार चौकोर, अष्टकोण या सोलह कोण की हो सकती है एवं त्वक्सार अर्थात् बाँस से निर्मित स्तम्भ सभी के लिये अनुकूल होती हैं।। १८४-१८५।। तालं च नालिकेरं क्रमुकं वेणुश्च केतकी चैव । इष्टशिलाभिर्वा वृक्षैर्देवद्विजमहीपानाम् ॥१८६॥ आश्रमिणामप्युदितान्यावासानि हि सर्वाणि । नैव शिलाभिर्विजां शूद्राणां वासके योग्यम् ॥१८७॥ ताल, नालिकेर (नारियल), क्रमुक, वेणु, (बाँस) एवं केतकी वृक्ष सभी के लिये अनुकूल होते हैं। ईंटों, प्रस्तरों एवं वृक्षों (काष्ठों) से निर्मित भवन देवों, ब्राह्मणों तथा राजाओं (क्षत्रिय) – इन सभी वर्ण के गृहस्वामियों के लिये उपयुक्त होता है; किन्तु वैश्यों एवं शूद्रों के भवन में प्रस्तर का प्रयोग कभी भी अनुकूल नहीं होता है।। १८६-१८७।। ☀️ मुखमण्डपानि ☀️ प्रासादाभिमुखे यान्यवरस्य श्रेष्ठमण्डपानि च वै । तानि विमानाद्यङ्गस्तम्भोत्तरवाजनानि सदृशानि ॥१८८॥ अथ मुनिवसुनन्दांशैर्र्धमांशैकां शहीनानि । पूर्वोदितमानानि हि सर्वाण्यङ्गानि वा विधेयानि ॥१८९॥ **मुखमण्डप—**मन्दिर के मुख-भाग पर निर्मित मण्डप श्रेष्ठ होता है। उनके आद्यङ्ग (अधिष्ठान), स्तम्भ, उत्तर एवं वाजन मन्दिर के समान होते हैं; किन्तु उनके माप उनसे सात, आठ, नौ या दस भाग कम होते हैं। अथवा सभी अंगों का माप पूर्व- वर्णित माप के समान रखना चाहिए।। १८८-१८९।।