भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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पञ्चविंशोऽध्यायः 卐 मण्डपसभाविधानम् ३५९ आख्यातं मण्डपानां तान्येवोक्तानि दिक्प्रमाणं च। पञ्चचतुस्त्रिद्विगुणस्तम्भव्यासेन भित्तिविष्कम्भम् ॥१९०॥ दारुस्तम्भव्यासात् पादोनं वा त्रिभागमर्धोनम्। कुड्यस्तम्भविशालं तेन विशालेन वा कुड्यम् ॥१९१॥ मण्डपों की दिशा एवं उनका प्रमाण वही होना चाहिए, जो मन्दिरों का कहा गया है। भित्ति की चौड़ाई स्तम्भ की चौड़ाई से पाँच, चार, तीन अथवा दुगनी होनी चाहिये। काष्ठस्तम्भ के व्यास से भित्ति की चौड़ाई उससे चतुर्थांश कम, तीसरे भाग के बराबर या आधे के बराबर होनी चाहिए। अथवा कुड्यस्तम्भ (भित्ति से संलग्न स्तम्भ) की चौड़ाई भित्ति की चौड़ाई बराबर भी हो सकती है॥१९०-१९१॥ ✱ मण्डपगर्भस्थानम् ✱ मध्याङ्गणस्य दिशि दक्षिणतोऽङ्घ्रिमूले द्वारस्य दक्षिणयुते तलिपे तु केचित्। कोणे द्वितीयचरणान्वितके त्रिगर्भ- स्थानं वदन्ति मुनयः खलु मण्डपानाम् ॥१९२॥ मण्डप का गर्भस्थल = शिलान्यास स्थल—मण्डप के गर्भ-स्थल तीन हो सकते हैं—मध्य आँगन के दक्षिण भाग में स्तम्भ के मूल में, द्वार के दक्षिण भाग में स्तम्भ के नीचे या कोने में द्वितीय स्तम्भ के नीचे। इन तीन स्थानों के विषय में मुनिजन कहते हैं॥१९२॥ ✱ अलिन्द्रम् ✱ उक्तव्यासायामभागादलिन्द्रं पूर्वेऽपूर्वे वाऽथ भक्त्या समन्तात्। भक्त्या वाध्यर्धः समन्तात्तु कुर्याद् देवानामुर्वीसुरोर्वीश्वराणाम् ॥१९३॥ अलिन्द—(मण्डप आदि के) सामने, पीछे या चारो ओर अलिन्द्र संज्ञक मार्ग होता है, जिसकी चौड़ाई मण्डप की चौड़ाई से एक भाग या डेढ़ भाग होनी चाहिये। यह देवों, ब्राह्मणों एवं राजाओं के मण्डपों के लिये विधान किया गया है। लम्बाई मण्डप के अनुसार होती है॥१९३॥ ✱ मालिका ✱ प्रासादाङ्गं मालिकाङ्गं यथावत् कुर्यात् कुड्यं मूलकुड्योपरिष्टात्।