मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६० मयमतम् पादं पादानामुपर्येव योज्य- मेकद्वित्रीण्यत्र भौमानि युक्त्या ॥१९४॥ मालिका—मालिका के अवयवों को प्रासाद के अंगों के अनुसार रखना चाहिये। ऊपरी तल की भित्ति भूतल की मूल भित्ति के ऊपर निर्मित करनी चाहिये एवं स्तम्भों को स्तम्भों के ऊपर निर्मित करना चाहिये। आवश्यकतानुसार तल एक-दो या तीन हो सकते हैं॥१९४॥ तत्तद्विस्तारायतौंशैर्विधिज्ञै- स्तेषां मानं पादबाह्ये तु केचित्। केचिद् भित्तेर्मध्यमं तद्वदन्ति शालाकारं वा सभाशीर्षकाङ्गम् ॥१९५॥ यत्तत् कुर्यान्मण्डपं वासयोग्यम् ॥१९६॥ कुछ विद्वानों के अनुसार स्तम्भों के बाहरी भाग के अनुसार उनकी लम्बाई एवं चौड़ाई का मान लेना चाहिये; जबकि अन्य विद्वानों के मतानुसार मान का ग्रहण भित्ति के मध्य से करना चाहिये। निवास-योग्य मण्डप के शीर्ष का निर्माण शाला के आकार का या सभा के आकार का करना चाहिये॥१९५-१९६॥ एकद्वित्रिचतुर्मुखानि च मुखे भद्राण्यभद्राणि का- न्यूर्ध्वे कूटयुतानि मध्यकपदे रङ्गाङ्गणाढ्यानि वै। सर्वाण्यायतमण्डपानि चतुरस्त्राभाणि वेदद्विज- क्षोणीशायतने मतानि च विशां शूद्रेषु दीर्घं मतम् ॥१९७॥ मण्डप के एक, दो, तीन या चार मुखभाग हो सकते हैं। ये भद्र से युक्त या भद्ररहित हो सकते हैं। मध्य भाग में ऊपर कूट हो सकता है, रङ्गस्थल या आँगन हो सकता है। ये मण्डप चौकोर या आयताकार हो सकते हैं। ये सभी देवों, ब्राह्मणों एवं राजाओं के अनुकूल होते हैं। आयताकार मण्डप वैश्यों एवं शूद्रों के अनुकूल होते हैं॥१९७॥ ❁ सभाविधानम् ❁ ✺ तत्र सभाभेदाः ✺ नवानां हि सभानां तु लक्षणं वक्ष्यतेऽधुना। आद्यं मल्लवसन्तं तत्परं पञ्चवसन्तकम् ॥१९८॥ एकवसन्तकं चैव सर्वतोभद्रकं तथा। पार्वतं कूर्मकं चैव माहेन्द्रं सोमवृत्तकम् ॥१९९॥