मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चविंशोऽध्यायः 卐 मण्डपसभाविधानम् ३६१ शुकविमानकं चैव श्रीप्रतिष्ठितमेव च। नवैताः सायताः पञ्चसभाः शेषा युगास्रकाः ॥२००॥ सभागार का विधान एवं भेद—अब नौ प्रकार के सभागारों के लक्षण का वर्णन किया जा रहा है। इनमें प्रथम मल्लवसन्तक संज्ञक है। इसके पश्चात् पञ्चवसन्तक, एकवसन्तक, सर्वतोभद्र, पार्वतकूर्त्मक, माहेन्द्र, सोमवृत्त, शुकविमान एवं श्रीप्रतिष्ठित होते हैं। इन नौ सभाओं में से पाँच आयताकार होती हैं तथा शेष चौकोर होती हैं॥१९८-२००॥ एकद्वित्रिचतुर्भागा व्यासा आद्या नृदेवयोः । व्यासायाममलङ्कारं स्तम्भानां भित्तिमानकम् ॥२०१॥ प्राग्वत् सर्वमलङ्कारं दण्डिकान्तविमानवत् । लुपाक्रियाक्रमं सर्वं यथा शिखरलक्षणे ॥२०२॥ देवों एवं मनुष्यों के सभागृह लम्बाई में चौड़ाई से एक, दो, तीन या चार भाग अधिक होते हैं। इनकी लम्बाई, चौड़ाई, भित्ति एवं स्तम्भों का मान पहले के सदृश होता है। सभी दण्डिका पर्यन्त अलंकार विमान (मन्दिर) के सदृश होते हैं। लुपा आदि का विधान उसी प्रकार होता है, जैसा शिखर-लक्षण में वर्णित है। ☀ कूटलक्षणम् ☀ कर्णरश्मियुता कूटसंज्ञा वेदास्त्रका सभा। वलक्षितस्वस्तिहीना कर्णाः कूटे च कोष्ठके ॥२०३॥ कूट का लक्षण—जिस चौकोर सभा के कोनों में रश्मियाँ (लुपा) हों, उसकी कूट संज्ञा होती है। कूट एवं कोष्ठक (लम्बा सभागार) दोनों सभागार कोणों में वलक्षितस्वस्ति से रहित होना चाहिये॥२०३॥ ☀ मल्लवसन्तम् ☀ एकभक्त्या चतुःस्तम्भा लुपाकोट्येककूटकम् । अष्टपुच्छवलक्षं तु नाम्ना मल्लवसन्तकम् ॥२०४॥ मल्लवसन्तक—मल्लवसन्त संज्ञक सभागृह एक भाग माप का, चार स्तम्भों, लुपाओं, कोटियों (कोटि लुपाओं, कोने की लुपाओं) तथा एक कूट वाला होता है। इसमें आठ पुच्छवलक्ष होते हैं॥२०४॥ ☀ पञ्चवसन्तकम् ☀ द्विभक्तिचतुरं चाष्टस्तम्भदीर्घलुपान्वितम् । वसुस्वस्तिवलक्षं तु मूलकूटं तु मध्यकम् ॥२०५॥