मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६२ मयमतम् चतुष्कर्णे चतुष्कूटा संज्ञा पञ्चवसन्तकम्। पञ्चवसन्तक—दो भाग माप की, आठ स्तम्भों एवं आठ लम्बी लुपाओं से युक्त सभा पञ्चवसन्तक संज्ञक होती है। इसमें आठ स्वस्तिकवलक्ष, मध्य में मूलकूट एवं चारो कोणों पर चार कूट होते हैं।।२०५।। ✺ एकवसन्तकम् ✺ त्रिभक्तिचतुरस्रं तु द्वादशस्तम्भसंयुक्तम् ॥२०६॥ द्विरष्टस्वस्तिपुच्छं तु सत्रयोदशकूटकम्। त्रिरष्टकवलक्षं तु स्यान्नाम्नैकवसन्तकम् ॥२०७॥ एकवसन्तक—एकवसन्तक संज्ञक सभागार तीन भाग माप का, चौकोर एवं बारह स्तम्भ से युक्त होता है। इसमें सोलह स्वस्तिपुच्छ, तेरह कूट एवं चौबीस वलक्ष होते हैं।।२०६-२०७।। ✺ सर्वतोभद्रम् ✺ युगभक्तियुगास्रं तु द्विरष्टाङ्घ्रिबहिस्ततः। अन्तःस्तम्भकलार्धं तु कलार्धं प्रांशुरश्मयः ॥२०८॥ अष्टद्विगुणकूटं तु त्रिरष्टस्वस्तिपुच्छकम्। षडष्टैवलक्षं तु मूलकूटमथैककम् ॥२०९॥ सर्वतोभद्रकं नाम्ना चतस्रश्चतुरस्रकम्। सर्वतोभद्र—यह सभागार चार कोणों वाला, चार भाग माप का, बाहर सोलह स्तम्भों से युक्त, भीतरी भाग में आठ स्तम्भ एवं आठ लम्बी लुपाओं से युक्त, सोलह कूट, चौबीस स्वस्तिपुच्छ तथा अड़तालीस वलक्षों से युक्त होता है। मध्य में एक कूट होता है। सर्वतोभद्र संज्ञक सभागार चार चौकोर (कक्षों) से युक्त होता है। ✺ पार्वतकूर्मकम् ✺ आयतास्रं चतुष्पञ्चभक्त्या पार्वतकूर्मकम् ॥२१०॥ अष्टादशदशाङ्घ्रि स्याद् बाह्येऽबाह्येऽष्टरश्मयः। द्विरष्टसप्तकूटानि षड्द्विसप्तबहिर्बहिः ॥२११॥ चतुष्षष्टिवलक्षानि चतुष्कोष्ठद्विरष्टकम्। पार्वतकूर्मक—पार्वतकूर्मक सभागार आयताकार, चार भाग चौड़ा तथा पाँच भाग लम्बा होता है। बाहरी भाग में अट्ठारह स्तम्भ एवं भीतरी भाग में दस स्तम्भ होते हैं तथा अट्ठारह रश्मियाँ (लुपायें) होती हैं। सोलह एवं चौदह कूट होते हैं। छः (या