भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

पृष्ठ 387, कुल 395 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 387

पञ्चविंशोऽध्यायः 卐 मण्डपसभाविधानम् ३६३ सोलह ) बाहर एवं चौदह भीतर होते हैं। इसमें चौंसठ वलक्ष तथा सोलह चतुष्कोष्ठ होते हैं।। २१०-२११।। ✺ माहेन्द्रम् ✺ चतुष्षड्भक्तिविस्तारं दैर्घ्यं विंशतिपादकम् ॥२१२॥ अन्तर्द्वादशपादं स्यादन्तःकूटं तथाष्टकम् । बहिर्द्विरष्टकूटं स्याद् षोडशप्रांशुरश्मयः ॥२१३॥ माहेन्द्र सभागृह चार भाग चौड़ा एवं छः भाग लम्बा होता है। इसमें बीस स्तम्भ एवं भीतर बारह स्तम्भ होते हैं। इसके भीतरी भाग में आठ कूट एवं बाहरी भाग में सोलह कूट होते हैं तथा सोलह लम्बी रश्मियाँ ( लुपायें ) होती हैं।।२१२-२१३।। त्रिरष्टस्वस्तिकं चैव मूलकूटत्रिकं भवेत् । साशीतिकवलक्षं तु नवत्रिंशतिकूटकम् ॥२१४॥ अन्तराङ्घ्रिविहीनं तु भक्त्या तत्रैव योजयेत् । नाम्ना माहेन्द्रकं प्रोक्तं राज्ञां प्राज्ञैर्मुनीश्वरैः ॥२१५॥ इसमें चौबीस स्वस्तिक एवं मध्य भाग में तीन कूट होते हैं तथा इसमें अस्सी वलक्ष एवं उन्तालीस कूट होते हैं। भीतरी भाग में स्तम्भ नहीं होते हैं एवं भाग के अनुसार वही योजना करनी चाहिये। मुनियों ने माहेन्द्र सभागार को राजाओं के अनुकूल बताया है।।२१४-२१५।। ✺ सोमवृत्तम् ✺ व्यासायाम्यं चतुःसप्तभक्त्यान्तर्मनुपादकम् । बाह्ये द्वाविंशतिस्तम्भं त्रिरष्टं स्वस्तिपुच्छकम् ॥२१६॥ षोडश प्रांशुरश्मिः स्यान्नवतिषड्वलक्षकम् । मूलान्तर्बाह्यकूटानि चतुर्दशनवद्वयम् ॥२१७॥ चतस्रः कोटयः कर्णधारासप्तकविग्रहाः । तदन्तर्द्धिनकं सोमवृत्तं नाम्ना समीरितम् ॥२१८॥ सोमवृत्त—इसकी चौड़ाई चार भाग एवं लम्बाई सात भाग होती है। भीतरी भाग में चौदह एवं बाहर बाईस स्तम्भ होते हैं तथा चौबीस स्वस्तिपुच्छ होते हैं। सोलह लम्बी रश्मियाँ एवं छियानबे वलक्ष होते हैं। मध्य भाग में चार कूट, भीतरी भाग में दस एवं बाहर अठारह कूट होते हैं। इसमें चार कोटियाँ ( कोटिलुपायें ) एवं सात कर्णधारायें होती हैं तथा मध्य भाग में स्तम्भ नहीं होते हैं। इस सभागृह की संज्ञा सोमवृत्त होती है।।२१६-२१८।।

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या) · पृष्ठ 387, कुल 395 में से · BharatKosha