मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६४ मयमतम् ✵ शुकविमानम् ✵ पञ्चाष्टभक्तिविस्तारं दैर्घ्यं षड्विंशदङ्घ्रिकम्। अष्टादशाङ्घ्रिकं चान्तश्चतुष्कोटिसमन्वितम् ॥२१९॥ द्वात्रिंशत् स्वस्तिकं चैव द्विसप्ततिवलक्षकम्। चतुष्कूटयुतं मूर्ध्नि द्विरष्टप्रांशुरश्मयः ॥१२०॥ अन्तर्बहिस्तु कूटानि त्रिरष्टैकादशद्वयम्। कर्णधाराष्टसंयुक्तं नाम्ना शुकविमानकम् ॥२२१॥ शुकविमान—यह सभागार पाँच भाग चौड़ा एवं आठ भाग लम्बा होता है। इसमें छब्बीस स्तम्भ होते हैं। अट्ठारह स्तम्भ भीतर होते हैं एवं चार कोटियों ( कोने की लुपाओं ) से युक्त होते हैं। यह बत्तीस स्वस्तिक एवं बहत्तर वलक्षों से युक्त, शिरोभाग पर चार कूटों से युक्त तथा सोलह रश्मियों ( लुपाओं ) से युक्त होता है। यह चौबीस अन्तःकूटों एवं बाईस बहिःकूटों से युक्त होता है। आठ कर्णधाराओं से समन्वित यह सभागार शुकविमान संज्ञक होता है॥२१९-२२१॥ ✵ श्रीप्रतिष्ठितम् ✵ पञ्चभक्त्या विशालं तु नवभक्त्या तदायतम्। अष्टाविंशतिगात्राणि द्वात्रिंशत् स्वस्तिपुच्छकम् ॥२२२॥ अन्तर्विंशतिकं स्तम्भं मध्यरश्मि तथैव च। पञ्चकूटयुतं मूर्ध्नि चतुष्कोटिसमन्वितम् ॥२२३॥ षष्ट्युत्तरशतं तत्र वलक्षं प्रविधीयते। द्विपञ्चांशं तु कूटानि नाम्नैतच्छ्रीप्रतिष्ठितम् ॥२२४॥ श्रीप्रतिष्ठित—इस सभागृह की चौड़ाई पाँच भाग एवं लम्बाई नौ भाग होती है। इसमें अट्ठाईस गात्र ( स्तम्भ, पाद ), बत्तीस स्वस्तिपुच्छ, बत्तीस भीतरी भाग के स्तम्भ एवं उसी प्रकार मध्य रश्मियाँ ( मध्य में स्थित लुपायें ), शिरोभाग पर पाँच कूट एवं चार कोटियों ( कोटि-लुपाओं ) से यह युक्त होता है। इसमें एक सौ साठ वलक्ष होते हैं। इसमें दस कूट होते हैं एवं इस सभागृह की संज्ञा श्रीप्रतिष्ठित होती है। तदेव व्यासायामे तु भक्तित्रयविवर्धनात्। चतुश्शालायतास्त्राभा द्विषड्द्विरष्टपादकाः ॥२२५॥ अन्तर्बहिस्तु भक्त्या च वारं शाला द्विभक्तिका। चतुर्द्विसप्ततिस्तम्भमन्तर्बाह्ये तु कीर्तितम् ॥२२६॥