मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चविंशोऽध्यायः 卐 मण्डपसभाविधानम् ३६५ प्रासादवदलङ्कृत्या चतुर्द्वारद्विचूलिकम् । भूपतेः श्रीप्रतिष्ठा स्यात् सभेयं श्रीप्रतिष्ठितम् ॥२२७॥ उसी लम्बाई एवं चौड़ाई के माप में तीन-तीन भाग बढ़ाने से चार आयताकार भवन बनते हैं, जिनमें बारह भीतरी भाग में एवं सोलह बाहरी भाग में स्तम्भ बनते हैं। इसमें एक भाग से वार ( मार्ग या पोर्च ) तथा दो भाग से शाला निर्मित होती है। बाहरी एवं भीतरी भाग में चार वार ( चार स्थानों पर ) बहत्तर स्तम्भ बनते हैं। मन्दिर के सदृश अलंकृत कर इसमें चार द्वार एवं दो चूलिकायें निर्मित होती हैं। यह श्रीप्रतिष्ठित संज्ञक सभागार राजा के लिये श्रीप्रतिष्ठा वाला ( प्रतिष्ठाकारक ) होता है॥२२५-२२७॥ एकैकभागवृद्ध्या तु भवत्युक्तेतरा सभा । छन्दं विकल्पमाभासं तत्तन्नाम्ना विधीयते ॥२२८॥ स्तम्भरश्मिवलक्षं च कूटं युक्त्या प्रयोजयेत् । यथारुचि यथाशोभं व्यासायामे तु भक्तयः ॥२२९॥ उपर्युक्त माप में एक-एक भाग बढ़ाने पर सभाओं के अन्य प्रकार प्राप्त होते हैं। उनके नाम छन्द, विकल्प एवं आभास हैं। उनमें स्तम्भ, रश्मि ( लुपा ), वलक्ष एवं कूट का आवश्यकतानुसार निर्माण करना चाहिये। लम्बाई एवं चौड़ाई के भाग ( माप की ईकाई ) इच्छानुसार एवं जिससे सभी सुन्दर लगे, उस प्रकार रखना चाहिये। प्रांशुरश्मियुतं कूटं कूटं वा चतुरस्रकम् । दण्डिकानिर्गमसमो पूर्वपादोत्तरोद्गमः ॥२३०॥ तुलाश्रप्रस्तरांशेन चूलिकाभागलम्बिकम् । ऋजु वा स्वस्तिकं ज्ञेयं वलक्ष्याय प्रवेशिता ॥२३१॥ कूट को लम्बी रश्मियों से युक्त निर्मित करना चाहिये अथवा कूट को चौकोर बनाना चाहिये। स्तम्भों के ऊपर उत्तर का उद्गम ( ऊँचाई ) दण्डिका के निर्गम के बराबर रखना चाहिये। चूलिका का लम्बिक ( ऊपर लटकता भाग ) तुला एवं प्रस्तर के भाग के अनुसार होना चाहिये। ऋजु अथवा स्वस्तिक वलक्ष में प्रविष्ट होना चाहिये। शिखावर्ग तथा सर्वे निष्कूटं च कचग्रहा । चूलिकाद्वयमध्यस्था नाम्ना स्याद्दर्णपट्टिका ॥२३२॥ वलयं त्रिगुणं व्यासाद् बाहुल्या लुपया समा । लुपापार्श्वद्वयारूढा वलयप्रोक्तनालिका ॥२३३॥ शिखावर्ग ( शिरोभाग ) तथा सभी कचग्रह विना कूट के होते हैं। दो चूलिकाओं