मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
पृष्ठ 390, कुल 395 में से
संदर्भ में पढ़ें३६६ मयमतम् के मध्य में स्थित संरचना वर्णपट्टिका संज्ञक होती है। वलय व्यास ( चौड़ाई ) से तीन गुना होना चाहिये एवं बाहुल्य को माप में लुपा के समान होना चाहिये। लुपा के दोनों पार्श्वों में वलयनालिका होनी चाहिये।।२३२-२३३।। प्रतिचूलिकविन्यासा मुद्गरालम्बना स्थिरा। प्रतिलोमानुलोमाभ्यामङ्गणास्ते वलक्षका ।।२३४।। द्विकोटिसङ्गममखे वेशगर्भप्रदक्षिणे। प्रथमं स्तम्भनीया च शिल्पिकर्ता विधीयते ।।२३४।। प्रतिचूलिक का विन्यास एवं मुद्गर का आलम्बन स्थिर होता है। आँगन के वलक्ष अनुलोम ( नीचे से ऊपर सीधे ) एवं प्रतिलोम ( विपरीत विधि ) से निर्मित होते हैं। दो कोटियों ( कोटि-लुपाओं ) का संयोग गर्भगृह के दाहिने छिद्र में होता है। शिल्पी को सर्वप्रथम स्तम्भ का विधान करना चाहिये।।२३४-२३५।। पादबन्धमधिष्ठानं स्तम्भायामार्धमिष्यते । अनुक्तं यदि किञ्चित्तद्वक्त्या तत्र प्रयोजयेत् ।।२३६।। हलाङ्गवत्कुड्ययुता सरङ्गका विरङ्गका वाप्यथ गर्भगॆहका। सभेति सभ्यैरुदिता सनातना सभालयत्त्वादिह सभ्यमार्गणम् ।।२३७।। इति मयमते वास्तुशास्त्रे मण्डपसभाविधानो नाम पञ्चविंशोऽध्यायः पादबन्ध अधिष्ठान स्तम्भ के माप का आधा होना चाहिये। यदि किसी अंग आदि का वर्णन नहीं किया गया हो तो उसका प्रयोग आवश्यकतानुसार करना चाहिये। सभा हल के लाङ्गल के समान भित्ति से युक्त, मध्य भाग रङ्ग से युक्त या रङ्ग से रहित हो सकता है। सभा सभा के अनुरूप ( सभ्य ) लोगों से बनती है—ऐसा प्राचीन विद्वानों ने कहा है। सभ्यजनों के मार्ग सभागार से निर्धारित होते हैं।।२३६-२३७।।