मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
पृष्ठ 391, कुल 395 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चविंशोऽध्यायः 卐 मण्डपसभाविधानम् ३६७ व्याख्यात्मक टिप्पणी मण्डप-निर्माणार्थ स्थलचयन ( श्लोक २-३ ) मण्डप के निर्माणयोग्य स्थल मानसार के अनुसार सभी देवालयों का साम्मुख्य, पुण्यक्षेत्र, आराम, ग्रामादि का मध्य, चारो दिशायें, दिक्कोण, भीतर या बाहर तथा गृह के मध्य भाग या गृह के सम्मुख भाग हैं— देवालयेषु सर्वेषु सम्मुखे बहुमण्डपम्। पुण्यक्षेत्रे तथारामे ग्रामादौ वास्तुमध्यमे ।। चतुर्दिक्षु विदिक्षु वापि बाह्याभ्यन्तरोऽथवा। नराणां गृहमध्ये च सम्मुखे मण्डपं तु वा।। ( मानसार-३४ ) मण्डप ( श्लोक ३-५ ) मानसार ( अ. ३४ ) में सभी के वासयोग्य याग-मण्डप, राजाओं के अभिषेक- योग्य नृत्त-मण्डप, विवाह के लिये मैत्र-मण्डप, उपनयन मण्डप, स्नपन मण्डप, बच्चों का मुखालोक मण्डप, सती-मण्डप, क्षौरकर्म के लिये मण्डप, अग्निकार्य के लिये मण्डप तथा सुखान्वितार्थ-मण्डप का वर्णन प्राप्त होता है— सर्वेषां वासयोग्यार्थं मण्डपं यागमण्डपम्। नृपाणामभिषेकार्थं मण्डपं नृत्तमण्डपम्।। पाणिपीडनसिद्ध्यर्थं तथा मैत्रं च मण्डपम्। उपनयनमण्डपं चैव तथा च स्नपनमण्डपम्।। मण्डप- भेद ( श्लोक ६-७ ) मानसार (३४.७६-७८) के अनुसार मण्डप सात प्रकार के होते हैं—हिमज, निषदज, विजय, माल्यज, पारियात्र, गन्धमादन एवं हेमकूट— प्रथमं हिमजं चैव ततो निषदजं भवेत्। तृतीयं विजयं चैव चतुर्थं माल्यजं तथा।। पञ्चमं पारियात्रं च षष्ठं स्याद् गन्धमादनम्। सप्तमं हेमकूटं स्यान्मण्डपाख्यानि सप्तकम्।। ( विश्वकर्मवास्तुशास्त्र-७४.१९-३३ ) में सूर्यकान्त, चन्द्रकान्त, इन्द्रकान्त, गन्धर्वकान्त, ब्रह्मकान्त मण्डपों का वर्णन प्राप्त होता है।