भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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३६८ मयमतम् शिल्परत्न (पूर्वभाग, ३९ अ.) में मुखमण्डप, अर्चना मण्डप, नाट्य मण्डप, नन्द्यावर्त मण्डप, स्वस्तिक मण्डप, श्रीप्रतिष्ठित मण्डप, जयभद्र मण्डप, माणिभद्र मण्डप, प्रतिमा मण्डप, स्नान मण्डप, नृत्त मण्डप, ब्रह्मासन मण्डप, सिद्ध मण्डप, श्रीकर मण्डप, विजय मण्डप, भद्र मण्डप, सभारङ्ग मण्डप आदि विभिन्न प्रकार के मण्डप, अधिवास मण्डप तथा नाट्य मण्डप आदि विविध मण्डपों का उल्लेख किया गया है। योनिकुण्ड-निर्माणविधि ( श्लोक ४७ ) योनिकुण्ड के निर्माण की विधि दौलतराम गौड़-प्रणीत सात 'कुण्ड निर्माण स्वाहाकार पद्धति' ( प्रकाशक श्री ठाकुर प्रसाद पुस्तक भण्डार, वाराणसी, १९८२ ) में इस प्रकार दी गई है— क्षेत्रे जिनांशे पुरतः शरांशान् संवर्ध्य च स्वीयरदांशमुक्तान्। कर्णाङ्घ्रिमानेन लिखेन्दुखण्डे प्रत्यक् पुरोऽङ्गाद्धुणतो भगाभम्।। चौबीस अंगुल का चतुरस्र बनाकर उसमें दक्षिणोत्तर आधे भाग में एक लम्बी रेखा बनानी चाहिये। पुनः पश्चिमोत्तर भाग के आधे भाग का दो भाग पूर्व एवं पश्चिम की ओर करे। फिर उसके आधे में एक कोने से दूसरे कोने तक टेढ़ी रेखा खींचनी चाहिये। इसी प्रकार दूसरे कोने से रेखा निर्मित होती है। इस प्रकार दोनों आधे भाग में चार टेढ़ी रेखायें होंगी। पूर्वनिर्मित चतुरस्र के ठीक पूर्व में मध्य से पांच अंगुल, एक यव तथा दो यूका बढ़ा दे। फिर चतुरस्र के ठीक मध्य से अर्थात् दक्षिण दिशा से सटी एक टेढ़ी रेखा इस प्रकार खींचे, जो पूर्व के मध्य में बढ़ी हुई पाँच अंगुल, एक यव एवं यूका वाली रेखा से ऊपरी भाग से मिल जाय। इसी तरह उत्तर दिशा से रेखा खींच कर बढ़ी रेखा से मिला दे। तदनन्तर नीचे परकाल को दक्षिण की ओर से और उत्तर की ओर से अलग-अलग घुमाकर घुमाते हुये पश्चिम भाग के ठीक मध्य में मिला दे। इस प्रकार योनिकुण्ड तैयार होता है। अर्धचन्द्रकुण्ड ( श्लोक ४८ ) पूर्वोक्त ग्रन्थ में अर्धचन्द्र कुण्ड का वर्णन इस प्रकार प्राप्त होता है— स्वशतांशयुतेषु भागहीनस्वधरिश्रीमितकर्कटेन मध्यात्। कृतवृत्तदलेऽग्रतश्च जीवां विदधात्विन्दुदलस्य साधुसिद्धयै।। चौबीस अंगुल का चतुरस्र बनाकर उस चतुरस्र के पूर्व दिशा में ढाई अंगुल हटाकर दक्षिणोत्तर एक लम्बी रेखा खींचनी चाहिये। उसी रेखा के मध्य से उन्नीस अंगुल, एक यव, एक यूका, पाँच लिक्षा, सात बालाग्र परकाल से नापकर अर्थात् साढ़े उन्नीस अंगुल को परकाल से नाप कर टेढ़ी रेखा खींचने से अर्धचन्द्र कुण्ड निर्मित होता है।