मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चविंशोऽध्यायः 卐 मण्डपसभाविधानम् ३६१ त्रिकोणकुण्ड ( श्लोक ४९ ) त्रिकोण कुण्ड बनाने की विधि पूर्वोक्त ग्रन्थ में इस प्रकार है— वह्नयंशं पुरतो विधाय च पुनः श्रोण्योश्चतुर्थांशकम्। चिह्नेषु त्रिषु सूत्रदानत इदं स्यात् त्र्यस्रिकप्रोज्झितम्।। चौबीस अंगुल के चतुरस्र के बाहर पश्चिम की ओर से वायव्य कोण और नैर्ऋत्य कोण की ओर छः-छः अंगुल और बढ़ाना चाहिये। अर्थात् छः अंगुल वायव्य कोण में और छः अंगुल नैर्ऋत्य कोण में बढ़ाना चाहिये। पुनः उस चतुरस्र की पूर्व दिशा के मध्य से आठ अंगुल लम्बी रेखा सीधी पूर्व दिशा की ओर बढ़ा दे। पुनः वायव्य कोण में बढ़ी हुई रेखा के अन्तिम भाग से एक टेढ़ी रेखा पूर्व दिशा में बढ़ी हुई रेखा से मिला दे। इसी प्रकार नैर्ऋत्य कोण से रेखा खींचने पर त्रिकोण कुण्ड तैयार होता है। वृत्त कुण्ड बनाने की विधि इस प्रकार है— विश्वांशैः स्वजिनांशकेन सहितै क्षेत्रे जिनांशे कृते। व्यासार्धेन मितेन मण्डलमिदं स्याद् वृत्तसंज्ञं शुभम्।। चौबीस अंगुल के चतुरस्र के मध्य से साढ़े तेरह अंगुल (तेरह अंगुल, चार यव, दो यूका, पाँच लिक्षा, तीन बालाग्र) का परकाल लेकर गोलाकार आकृति बनाने पर वृत्तकुण्ड का निर्माण होता है। षट्कोण कुण्ड ( श्लोक ५० ) 'कुण्डनिर्माण-स्वाहाकारपद्धतिः' में षट्कोण कुण्ड-निर्माण की दो विधियाँ वर्णित हैं। प्रथम विधि के अनुसार चौबीस अंगुल के चतुरस्र के ऊपर अट्ठारह अंगुल, दो यव के माप का वृत्त खींचे और उस पर छः निशान बराबर दूरी पर लगा दे। उन चिह्नों से मिलाते हुये रेखा खींचने पर षडस्र कुण्ड की आकृति निर्मित होती है— भक्तक्षेत्रजिनांशैर्धृतिमितलवकैः स्वाङ्घ्रिशैलांशयुक्तैः व्यासाद्धैन्मण्डले तन्मितधृतगुणके कर्कटे चेन्दुदिक्तः। षट्चिह्नेषु प्रदद्याद्रसमितगुणकानेकमोक्तु हित्वा नाशै सन्ध्यतु दोषामपि च वृतिकृतेर्नेत्ररम्यं षडस्रम्।। दूसरी विधि इस प्रकार है— अथवा जिनभक्तकुण्डमानतिथिभागैः स्वरवभूपभागहीनैः। मितकर्कटोद्भव वे तु वृत्ते विधुदिक्तः समषड्भुजैः षडस्रम्।। चौबीस अंगुल का चतुरस्र बनाकर उसके ऊपर चौदह अंगुल, सात यव और
- यूका का एक गोलाकार वृत्त बनाना चाहिये। उस वृत्त में छः बराबर चिह्न कर रेखायें खींचने से षडस्र कुण्ड निर्मित होता है। मय०-२४