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मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

पञ्चविंशोऽध्यायः 卐 मण्डपसभाविधानम् ३६१ त्रिकोणकुण्ड ( श्लोक ४९ ) त्रिकोण कुण्ड बनाने की विधि पूर्वोक्त ग्रन्थ में इस प्रकार है— वह्नयंशं पुरतो विधाय च पुनः श्रोण्योश्चतुर्थांशकम्। चिह्नेषु त्रिषु सूत्रदानत इदं स्यात् त्र्यस्रिकप्रोज्झितम्।। चौबीस अंगुल के चतुरस्र के बाहर पश्चिम की ओर से वायव्य कोण और नैर्ऋत्य कोण की ओर छः-छः अंगुल और बढ़ाना चाहिये। अर्थात् छः अंगुल वायव्य कोण में और छः अंगुल नैर्ऋत्य कोण में बढ़ाना चाहिये। पुनः उस चतुरस्र की पूर्व दिशा के मध्य से आठ अंगुल लम्बी रेखा सीधी पूर्व दिशा की ओर बढ़ा दे। पुनः वायव्य कोण में बढ़ी हुई रेखा के अन्तिम भाग से एक टेढ़ी रेखा पूर्व दिशा में बढ़ी हुई रेखा से मिला दे। इसी प्रकार नैर्ऋत्य कोण से रेखा खींचने पर त्रिकोण कुण्ड तैयार होता है। वृत्त कुण्ड बनाने की विधि इस प्रकार है— विश्वांशैः स्वजिनांशकेन सहितै क्षेत्रे जिनांशे कृते। व्यासार्धेन मितेन मण्डलमिदं स्याद् वृत्तसंज्ञं शुभम्।। चौबीस अंगुल के चतुरस्र के मध्य से साढ़े तेरह अंगुल (तेरह अंगुल, चार यव, दो यूका, पाँच लिक्षा, तीन बालाग्र) का परकाल लेकर गोलाकार आकृति बनाने पर वृत्तकुण्ड का निर्माण होता है। षट्कोण कुण्ड ( श्लोक ५० ) 'कुण्डनिर्माण-स्वाहाकारपद्धतिः' में षट्कोण कुण्ड-निर्माण की दो विधियाँ वर्णित हैं। प्रथम विधि के अनुसार चौबीस अंगुल के चतुरस्र के ऊपर अट्ठारह अंगुल, दो यव के माप का वृत्त खींचे और उस पर छः निशान बराबर दूरी पर लगा दे। उन चिह्नों से मिलाते हुये रेखा खींचने पर षडस्र कुण्ड की आकृति निर्मित होती है— भक्तक्षेत्रजिनांशैर्धृतिमितलवकैः स्वाङ्घ्रिशैलांशयुक्तैः व्यासाद्धैन्मण्डले तन्मितधृतगुणके कर्कटे चेन्दुदिक्तः। षट्‌चिह्नेषु प्रदद्याद्रसमितगुणकानेकमोक्तु हित्वा नाशै सन्ध्यतु दोषामपि च वृतिकृतेर्नेत्ररम्यं षडस्रम्।। दूसरी विधि इस प्रकार है— अथवा जिनभक्तकुण्डमानतिथिभागैः स्वरवभूपभागहीनैः। मितकर्कटोद्भव वे तु वृत्ते विधुदिक्तः समषड्भुजैः षडस्रम्।। चौबीस अंगुल का चतुरस्र बनाकर उसके ऊपर चौदह अंगुल, सात यव और

  • यूका का एक गोलाकार वृत्त बनाना चाहिये। उस वृत्त में छः बराबर चिह्न कर रेखायें खींचने से षडस्र कुण्ड निर्मित होता है। मय०-२४

३७० मयमतम् पद्मकुण्ड ( श्लोक ५१ ) पद्मकुण्ड की विधि पूर्वोक्त ग्रन्थ में इस प्रकार है— अष्टांशाच्च यतश्च वृत्तशरके यत्रादिमं कर्णिका युग्मे षोडशकेशराणि चरमे स्वाष्टत्रिभागोनिते। भक्ते षोडशधा शरान्तरधृते स्युः कर्कटैऽष्टौ छदाः सर्वास्तानखनकर्णिकां त्यज निजायामोच्चकां स्यात्कजम्।। ग्रन्थकार के अनुसार चौबीस अंगुल का चतुरस्र बनाकर उसके ठीक मध्य में तीन अंगुल का वृत्त बनाना चाहिये। तदनन्तर उस वृत्त के ऊपर छः अंगुल, नौ अंगुल, बारह अंगुल, साढ़े चौदह अंगुल माप के परकाल से वृत्त निर्मित करना चाहिये। तदनन्तर तीन तथा छः अंगुल के वृत्त को छोड़कर पूर्व, पश्चिम, दक्षिण और उत्तर दिशा में एक- एक चिह्न अंकित करना चाहिये। पुनः नैर्ऋत्य, वायव्य, ईशान और अग्निकोण में एक-एक चिह्न अंकित करना चाहिये। इस प्रकार आठ चिह्न बनते हैं। पुनः दिशाओं एवं विदिशाओं में मध्य में आठ चिह्न बनाना चाहिये। सोलह चिह्न हो जाने पर एक- एक चिह्न छोड़कर पद्माकृति निर्मित करने पर पद्मकुण्ड का निर्माण होता है। अष्टकोण कुण्ड ( श्लोक ५२ ) अष्टकोण कुण्ड के निर्माण की दो विधियाँ पूर्वोक्त ग्रन्थ में वर्णित हैं। प्रथम विधि के अनुसार चौबीस अंगुल चतुरस्र के ठीक मध्य में साढ़े अट्ठारह अंगुल का वृत्त निर्मित कर उसमें बराबर दूरी पर सोलह चिह्न लगाना चाहिये। तदनन्तर दिशा एवं दिक्कोण के मध्य चिह्न से दिशाओं एवं विदिशाओं के चिह्नों को छोड़कर रेखायें खींचने से अष्टास्र कुण्ड निर्मित होता है— क्षेत्रे जिनांशे गजचन्द्रभागैः स्वाष्टाक्षिभागेन युतैस्तु वृत्ते। विदिग्दिशोरन्तरतोऽष्टसूत्रैस्तृतीययुक्तैरिदमष्टकोणम् ।। दूसरी विधि के अनुसार चौबीस अंगुल के चतुरस्र पर चौदह अंगुल, दो यव एवं तीन यूका माप का एक वृत्त खींचना चाहिये। इस वृत्त में आठ चिह्न दिशा एवं विदिशा छोड़कर ( उनके मध्य में ) बराबर दूरी पर लगाना चाहिये एवं उन चिह्नों को रेखाओं से मिलाने पर अष्टास्र कुण्ड निर्मित होता है— मध्ये गुणे वेदमयैर्विभक्ते शक्रैर्मिजर्ध्याब्धिलवेन युक्तैः। वृत्ते कृते दिग्विदिगान्तराले गजैर्भुजैः स्यादथवाष्टकोणम्।। जलक्रीड़ा मण्डप ( श्लोक १७६-१८१ ) जलक्रीड़ा-मण्डप का वर्णन विभिन्न वास्तुग्रन्थों में प्राप्त होता है। राजभवन की क्रीडा-वाटिका में जलयन्त्रों से युक्त धारा-मण्डप का निर्माण होता है—

पञ्चविंशोऽध्यायः 卐 मण्डपसभाविधानम् ३७१ वामे भागे दक्षिणे वा नृपाणां त्रेधा कार्या वाटिका क्रीडनार्थम्। एकद्वित्रिदण्डसंख्याशतं स्यान्मध्ये धारामण्डपं तोययन्त्रैः ।। ( राजवल्लभमण्डन-९.१८ ) जलयन्त्र की स्थापना के लिये भद्र, जलवापी, वेदिका, कोणों में कूप एवं मध्य में बारह स्तम्भ होते हैं— क्षेत्रं सप्तविभागभाजितमतो भद्रं च भागत्रयं तन्मध्ये जलवापिका जिनपदैरेकांशतो वेदिका। स्तम्भैर्द्वादशभिश्च मध्यरचितः कोणेषु कूपान्वितः कर्तव्यो जलयन्त्र एष विधिवद् भोगाय पृथ्वीभुजाम् ।। ( राजवल्लभमण्डन-९.१९ ) जलयन्त्र एवं धारा-मण्डप का वर्णन अपराजितपृच्छा (अ.-८८-९९) में विस्तार से प्राप्त होता है। अलिन्द्र ( श्लोक १९३ ) ग्रन्थ में वर्णित 'अलिन्द्र' सम्भवतः अन्य वास्तुग्रन्थों में वर्णित अलिन्द है, जिसे ओसारा या बरामदा कहा जाता है।