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मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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तृतीयोऽध्यायः 卐 भूपरीक्षा १३ गृध्रकङ्कवराहर्क्षश्येनगोमायुवायसैः । संयुक्ता दूरपानीया भूराग्नेयी विनिन्दिता।। ( ३-१२ ) वायवी भूमि— अक्षस्नुहिकलिङ्गार्कपीलुश्लेष्मातकण्टकैः । युक्ता या निर्जला भूमिरशुभा वायवी स्मृता।। ( ३-१३ ) वर्ण, गन्ध स्वाद के अनुसार भूमि— विप्रादिक्रमतः कुशेषुवनदूर्वाकाशयुक्ता भुव- स्तुल्यातानवितानसिन्धुररसाब्ध्यंशाधिदीर्घा अपि। श्वेतापाटलपीतमेचकरुचश्चाज्यासृगन्नासवा- मोदाः स्वादुकषायतिक्तकटुकास्वादान्विताश्च स्मृताः।। ( ३-१४ ) (ख) विष्णुसंहिता ( द्वादश पटल ) में भी सुपद्मा, भद्रिका, पूर्णा एवं धूम्रा भूमि की चर्चा प्राप्त होती है तथा गुण के अनुसार तीन भेद—उत्तमा, अधमा एवं मध्यमा प्राप्त होते हैं— त्रिधोत्तमाधमा मध्या चतुर्धा जातिभेदतः । सुपद्मा भद्रिका पूर्णा धूम्रेत्यपि तथैव भूः ।।२।। वर्ण, गन्ध एवं स्वादादि के अनुसार भूमि— विप्रादीनां स्मृता भूमिः सर्वेषा वोत्तमस्य या। सिता रक्ता च पीता च कृष्णा विप्रादिभूस्तथा ।।७।। मधुरा च कषाया च तिक्ता च कटुका क्रमात् । घृतासृक्चरुविड्गन्धा बहुवर्णा तु वर्जिता ।।८।। ग्रन्थकार ने ( श्लोक-१०-१४ ) निन्दित भूमि के दोषों की भी चर्चा की है, जो मयमत के वर्णन की पुष्टि करता है। (ग) विश्वकर्मवास्तुशास्त्र ( पञ्चम अध्याय ) में गुणभेद के अनुसार उत्तमा, मध्यमा एवं अधमा ( श्लोक-६ ) तीन प्रकार की भूमि का उल्लेख प्राप्त होता है। रस, वर्ण, स्पर्श, गन्ध एवं अन्य लक्षणों के अनुसार भूमि के भेद इस प्रकार प्राप्त होते हैं— ब्राह्मणी भूमि— माधुर्यमृत्तिका भूमिर्देवविप्रहितप्रदा। तथोदुम्बरवृक्षाढ्या श्वेतवर्णा च भूरपि ।।८।। ( उदीच्याञ्च जलोपेता भूरियं चोत्तमा मता । ) क्षत्रिया भूमि— कषायमृत्तिका भूमी रक्तवर्णा च भूरपि ।।९।।

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