मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ चतुर्थोऽध्यायः ( भूपरिग्रहः ) ✺ भूग्रहणे कर्त्तव्यानि ✺ आकारवर्णशब्दादिगुणोपेतं भुवः स्थलम् । संगृह्य स्थपतिः प्राज्ञो दत्त्वा देवबलिं पुनः ॥१॥ निर्माण-हेतु भूमि का ग्रहण—आकार, रंग एवं शब्द आदि गुणों से युक्त भूमि का चयन करने के पश्चात् बुद्धिमान स्थपति को देवबलि ( वास्तुदेवों की पूजा ) करनी चाहिये। इसके पश्चात्—॥१॥ स्वस्तिवाचकघोषेण जयशब्दादिमङ्गलैः । अपक्रामन्तु भूतानि देवताश्च सराक्षसाः॥२॥ वह स्वस्तिवाचक घोष एवं जय आदि मंगलकारी शब्दों के साथ इस प्रकार कहे—राक्षसों के साथ देवता एवं भूत ( मानवेतर प्राणी ) दूर हो जायँ।।२।। वासान्तरं व्रजन्त्वस्मात् कुर्या भूमिपरिग्रहम्। इति मन्त्रं समुच्चार्य विहिते भूपरिग्रहे ॥३॥ वे इस भूमि से अन्यत्र स्थान पर जाकर अपना निवास बनायें। हम इस भूमि को ( .गृहनिर्माण-हेतु ) ग्रहण कर रहे हैं। इस मन्त्र का उच्चारण करते हुये ग्रहण की गई भूमि पर ( अधोलिखित कार्य करना चाहिये )॥३॥ कृष्ट्वा गोमयमिश्राणि सर्वबीजानि वापयेत् । दृष्ट्वा तानि विरूढानि फलपक्वगतानि च ॥४॥ उस भूमि में हल चलवा कर गोबरमिश्रित सभी प्रकार के बीजों को उसमें बो देना चाहिये। उन बीजों को उगा हुआ एवं उनमें पके हुये फल देख कर—।।४।। सवृषाश्च सवत्साश्च ततो गास्तत्र वासयेत्। यतो गोभिः परिक्रान्तमुपघ्राणैश्च पूजितम् ॥५॥ वृषभ एवं बछड़ों के साथ गायों को वहाँ बसा देना चाहिये; क्योंकि गायों के वहाँ चलने एवं सूंघने से वह भूमि पवित्र हो जाती है।।५।।