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मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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२४ मयमतम् २. राजवल्लभमण्डन ( १.३९ ) के अनुसार बारह अङ्गुल का एक ताल ( बालिशत, बित्ता ), दो ताल का एक हस्त, पौने दो हाथ का एक किष्कु, चार हाथ का चाप, दो सहस्र दण्ड का क्रोश, उसका दुगुना गव्यूतिका, दो गव्यूतिका का एक योजन तथा सौ योजन का एक कोटि होता है— तालो द्वादशमात्रिकापरिमितस्तालद्वयं स्यात्करः पादोनद्विकरोऽपि किष्कुरुदितश्चापं चतुर्भिः करैः। क्रोशो दण्डसहस्रयुग्ममुदितो द्वाभ्यां च गव्यूतिका ताभ्यां योजनमेव भूमिरखिला कोटिः शतं योजनैः।। ३. मापन के मूल में यव-मान प्रधान है। इससे अङ्गुल-माप प्राप्त होता है। सम- राङ्गणसूत्रधार एवं अपराजितपृच्छा में तीन प्रकार के—ज्येष्ठ, मध्यम एवं कनिष्ठ अङ्गुल माप प्राप्त होते हैं; जो आठ, सात एवं छः यवों से निर्मित होते हैं— (क) अष्टाभिः सप्तभिः षड्भिरङ्गुलानि यवोदरैः। ज्येष्ठमध्यकनिष्ठानि तच्चतुर्विंशतिः करः।। सोऽष्टभिः पर्वभिर्युक्तः करः कार्यों विजानता। करस्यार्धं चतुःपर्वं शेषं स्यात् भक्तमङ्गुलैः।। ( समराङ्गणसूत्रधार ९.५-६ ) (ख) ज्येष्ठं चाष्टयवैः प्रोक्तं मध्यमं सप्तभिर्यवैः। स्यात्कनिष्ठं षड्यवैस्तु चतुर्विंशतिभिः करैः।। ( अपराजितपृच्छा-४१.९ ) इसके अतिरिक्त अपराजितपृच्छा ( अ. ४१ ) में परमाणु, केशाग्र, लिक्षा, यूका एवं यव मान की चर्चा भी प्राप्त होती है। ४. विश्वकर्मवास्तुशास्त्र ( ७.७२-७७ ) में मान की चर्चा प्राप्त होती है। परमाणु मान के अतिरिक्त शालि, व्रीहि, अङ्गुल, वितस्ति, हस्त, धनुर्मुष्टि, दण्ड, नृपदण्ड एवं ब्रह्मदण्ड का वर्णन प्राप्त होता है— तस्मान्मानवमानन्तु प्रोच्यते फलदायि तत्। शालिव्रीहिस्तु सर्वत्र सिद्धमानोदयो मतः।।७३।। तैर्व्रीहिभिस्त्रिभिर्युक्तमङ्गुलं मानवं मतम्। द्वादशाङ्गुलसंयुक्तो वितस्तिरभिधीयते।।७४।। वितस्तिद्वयसंयुक्तं हस्तमानमुदीरितम्। हस्तमानद्वयोपेतो धनुर्मुष्टिरितीरिता।।७५।।

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