मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमोऽध्यायः 卐 मानोपकरणम् २३ ये सभी शिल्पी अपने गुरु ( प्रधान स्थपति ) का सम्मान करने वाले, सदा प्रसन्न रहने वाले एवं सदैव स्थपति की आज्ञा का अनुसरण करने वाले होते हैं। उनके लिये स्थपति ही विश्वकर्मा माना जाता है॥२३॥ एभिर्विना हि सर्वेषां कर्म कर्तुं न शक्यते। तस्मादेतत् सदा पूज्यं स्थपत्यादिचतुष्टयम् ॥२४॥ उपर्युक्त ( सूत्रग्राही, तक्षक एवं वर्धकि ) शिल्पियों के विना स्थपति ( भवन- निर्माणसम्बन्धी ) सभी कार्य नहीं कर सकता है। इसलिये स्थपति आदि चारो शिल्पियों का सदा सत्कार करना चाहिये॥२४॥ एभिः स्थपत्यादिभिरत्र लोके विना ग्रहीतुं सुकृतं न शक्यम्। तैरेव सार्धं गुरुणाऽथ तस्माद् भजन्ति मोक्षं भवतस्तु मर्त्याः ॥२५॥ इति मयमते मानोपकरणं नाम पञ्चमोऽध्यायः इस संसार में इन स्थपति आदि को ग्रहण किये विना कोई भी ( निर्माणसम्बन्धी ) सुन्दर कार्य सम्भव नहीं है। अतः तीनों शिल्पियों को उनके गुरु ( प्रधान स्थपति ) के साथ ग्रहण करना चाहिये। इसी से मनुष्य संसार ( शीत, धूप, वर्षा एवं गृह के अभाव में होने वाले कष्टों ) से मुक्ति प्राप्त करते हैं॥२५॥ व्याख्यात्मक टिप्पणी माप-विधान ( श्लोक १-१२ ) १. माप के विवरण के विषय में मत्स्यपुराण ( अ. २५८ ) उल्लेखनीय है। इसके अनुसार जाली के भीतर से सूर्य-रश्मियों के प्रविष्ट होने पर जो उड़ता हुआ धूलिकण स्पष्ट दिखाई पड़ता है, उसे 'त्रसरेणु' कहते हैं। आठ त्रसरेणु का एक बालाग्र, आठ बालाग्र से एक लिक्ख्या, आठ लिक्ख्या से एक यूका, आठ यूका से एक यव तथा आठ यव से एक अङ्गुल होता है— जालान्तरप्रविष्टानां भानूनां यद्रजःस्फुटम्। त्रसरेणुः स विज्ञेयो बालाग्रं तैरथाष्टभिः॥१७॥ तदष्टकेन लिक्ख्या तु यूका लिक्ख्याष्टकैर्मता। यवो यूकाष्टकं तद्वदष्टभिस्तैस्तदङ्गुलम्॥१८॥