मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२ मयमतम् शिकार, जुआ, स्त्री एवं सुरापान-अर्थशास्त्र-८.३.२३, ३२) से रहित होना चाहिये। ✺ सूत्रग्राही ✺ सुनामा दृढबुद्धिश्च वास्तुविद्याब्धिपारगः । स्थपतेस्तस्य शिष्यो वा सूत्रग्राही सुतोऽथवा ॥१८॥ 'सूत्रग्राही' स्थपति का पुत्र या शिष्य होता है। उसे यशस्वी, दृढ़ मानसिकता से युक्त एवं वास्तु-विद्या में पारंगत होना चाहिये ।।१८।। स्थपत्याज्ञानुसारी च सर्वकर्मविशारदः । सूत्रदण्डप्रपातज्ञो मानोन्मानप्रमाणवित् ॥१९॥ सूत्रग्राही को स्थपति की आज्ञानुसार कार्य करने वाला एवं ( स्थापत्यसम्बन्धी ) सभी कार्यों का ज्ञाता होना चाहिये। उसे सूत्र एवं दण्ड के प्रयोग का ज्ञाता एवं विविध प्रकार के मापन मान-उन्मान (लम्बाई, चौड़ाई, ऊँचाई एवं उनके उचित अनुपात ) का ज्ञाता होना चाहिये ।। १९ ।। ✺ तक्षकः ✺ शैलदार्विष्टकादीनां सूत्रग्राहिवशानुगः । तक्षणात् स्थूलसूक्ष्माणां तक्षकः स तु कीर्तितः ॥२०॥ पत्थर, काष्ठ एवं ईंट आदि को मोटा एवं पतला काटने के कारण वह शिल्पी 'तक्षक' कहलाता है। यह सूत्रग्राही की इच्छानुसार कार्य करता है।।२०।। ✺ वर्धकिः ✺ मृत्कर्मज्ञो गुणी शक्तः सर्वकर्मस्वतन्त्रकः । तक्षितानां तक्षकानामुपर्युपरि युक्तितः ॥२१॥ वर्धकि मृत्तिका के कर्म (गृहनिर्माण) का ज्ञाता, गुणवान, अपने कार्य में समर्थ, अपने क्षेत्र से सम्बद्ध सभी कार्यों को स्वतन्त्रतापूर्वक करने वाला, तक्षक द्वारा काटे- छाँटे गये सभी टुकड़ों को युक्तिपूर्वक जोड़ सकता है।।२१।। वृद्धिकृद् वर्धकिः प्रोक्तः सूत्रग्राह्यनुगः सदा । कर्मिणो निपुणाः शुद्धा बलवन्तो दयापराः ॥२२॥ सर्वदा सूत्रग्राही के अनुसार कार्य करने वाला शिल्पी 'वर्धकि' कहा जाता है। इस प्रकार ये सभी शिल्पी कार्य करने वाले, अपने कार्यों में कुशल, शुद्ध, बलवान, दयावान होते हैं।।२२।। गुरुभक्ताः सदा हृष्टाः स्थपत्याज्ञानुगाः सदा । तेषामेव स्थपत्याख्यो विश्वकर्मेति संस्मृतः ॥२३॥