भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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पञ्चमोऽध्यायः 卐 मानोपकरणम् २१ एवमेवं विदित्वा तु स्थपतिर्मानयेद् दृढम्। इस प्रकार माप का ज्ञान करने के पश्चात् स्थपति को दृढ़तापूर्वक ( सावधानी पूर्वक ) मापनकार्य करना चाहिये।। ☀ शिल्पिलक्षणम् ☀ भवन्ति शिल्पिनो लोके चतुर्धा स्वस्वकर्मभिः ॥१३॥ संसार में अपने-अपने कार्यों के अनुसार चार प्रकार के शिल्पी होते हैं।।१३।। स्थपतिः सूत्रग्राही च वर्धकिस्तक्षकस्तथा। प्रसिद्धदेशसङ्कीर्णजातिजोऽभीष्टलक्षणः ॥१४॥ चार प्रकार के शिल्पी—स्थपति, सूत्रग्राही, वर्धकि ( बढ़ई ) एवं तक्षक ( छीलने, काटने एवं आकृतियाँ उकेरने वाले ) होते हैं। ये सभी ( स्थापत्यादि कर्म के लिये ) प्रसिद्ध स्थान वाले, सङ्कीर्ण जाति से उत्पन्न एवं अपने कार्यों के लिये अभीष्ट गुणों से युक्त होते हैं।।१४।। ☀ स्थपतिः ☀ स्थपतिः स्थापनार्हः स्यात् सर्वशास्त्रविशारदः । न हीनाङ्गोऽतिरिक्ताङ्गो धार्मिकस्तु दयापरः ॥१५॥ ‘स्थपति’संज्ञक शिल्पी को भवन की स्थापना में योग्य एवं ( गृह-निर्माण के सहायक ) अन्य शास्त्रों का भी ज्ञाता होना चाहिये। शारीरिक दृष्टि से सामान्य से न कम अङ्गों वाला तथा न ही अधिक अङ्गों वाला ( अर्थात् सम्पूर्ण रूप से स्वस्थ ), धार्मिक वृत्ति वाला एवं दयावान होना चाहिये।।१५।। अमात्सर्योऽनसूयश्चातन्द्रितस्त्वभिजातवान् । गणितज्ञः पुराणज्ञः सत्यवादी जितेन्द्रियः ॥१६॥ स्थपति को द्वेषरहित, ईर्ष्यारहित, सावधान, आभिजात्य गुणों से युक्त, गणित तथा पुराणों का ज्ञाता, सत्यवक्ता एवं इन्द्रियों को वश में रखने वाला होना चाहिये।।१६।। चित्रज्ञः सर्वदेशज्ञश्चान्नदश्चाप्यलुब्धकः । अरोगी चाप्रमादी च सप्तव्यसनवर्जितः ॥१७॥ स्थपति को चित्रकर्म ( गृह के नक्शा आदि बनाने ) में निपुण, सभी देशों का ज्ञाता ( स्थान के भूगोल का ज्ञाता ), ( अपने सहायकों को ) अन्न देने वाला, अलोभी, रोगरहित, आलस्य एवं भूल न करने वाला तथा सात प्रकार के व्यसनों ( वाचिक आघात पहुँचाना, सम्पत्ति के लिये हिंसा का मार्ग अपनाना, शारीरिक चोट पहुँचाना,