मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
पञ्चमोऽध्यायः 卐 मानोपकरणम् २३ ये सभी शिल्पी अपने गुरु ( प्रधान स्थपति ) का सम्मान करने वाले, सदा प्रसन्न रहने वाले एवं सदैव स्थपति की आज्ञा का अनुसरण करने वाले होते हैं। उनके लिये स्थपति ही विश्वकर्मा माना जाता है॥२३॥ एभिर्विना हि सर्वेषां कर्म कर्तुं न शक्यते। तस्मादेतत् सदा पूज्यं स्थपत्यादिचतुष्टयम् ॥२४॥ उपर्युक्त ( सूत्रग्राही, तक्षक एवं वर्धकि ) शिल्पियों के विना स्थपति ( भवन- निर्माणसम्बन्धी ) सभी कार्य नहीं कर सकता है। इसलिये स्थपति आदि चारो शिल्पियों का सदा सत्कार करना चाहिये॥२४॥ एभिः स्थपत्यादिभिरत्र लोके विना ग्रहीतुं सुकृतं न शक्यम्। तैरेव सार्धं गुरुणाऽथ तस्माद् भजन्ति मोक्षं भवतस्तु मर्त्याः ॥२५॥ इति मयमते मानोपकरणं नाम पञ्चमोऽध्यायः इस संसार में इन स्थपति आदि को ग्रहण किये विना कोई भी ( निर्माणसम्बन्धी ) सुन्दर कार्य सम्भव नहीं है। अतः तीनों शिल्पियों को उनके गुरु ( प्रधान स्थपति ) के साथ ग्रहण करना चाहिये। इसी से मनुष्य संसार ( शीत, धूप, वर्षा एवं गृह के अभाव में होने वाले कष्टों ) से मुक्ति प्राप्त करते हैं॥२५॥ व्याख्यात्मक टिप्पणी माप-विधान ( श्लोक १-१२ ) १. माप के विवरण के विषय में मत्स्यपुराण ( अ. २५८ ) उल्लेखनीय है। इसके अनुसार जाली के भीतर से सूर्य-रश्मियों के प्रविष्ट होने पर जो उड़ता हुआ धूलिकण स्पष्ट दिखाई पड़ता है, उसे 'त्रसरेणु' कहते हैं। आठ त्रसरेणु का एक बालाग्र, आठ बालाग्र से एक लिक्ख्या, आठ लिक्ख्या से एक यूका, आठ यूका से एक यव तथा आठ यव से एक अङ्गुल होता है— जालान्तरप्रविष्टानां भानूनां यद्रजःस्फुटम्। त्रसरेणुः स विज्ञेयो बालाग्रं तैरथाष्टभिः॥१७॥ तदष्टकेन लिक्ख्या तु यूका लिक्ख्याष्टकैर्मता। यवो यूकाष्टकं तद्वदष्टभिस्तैस्तदङ्गुलम्॥१८॥
२४ मयमतम् २. राजवल्लभमण्डन ( १.३९ ) के अनुसार बारह अङ्गुल का एक ताल ( बालिशत, बित्ता ), दो ताल का एक हस्त, पौने दो हाथ का एक किष्कु, चार हाथ का चाप, दो सहस्र दण्ड का क्रोश, उसका दुगुना गव्यूतिका, दो गव्यूतिका का एक योजन तथा सौ योजन का एक कोटि होता है— तालो द्वादशमात्रिकापरिमितस्तालद्वयं स्यात्करः पादोनद्विकरोऽपि किष्कुरुदितश्चापं चतुर्भिः करैः। क्रोशो दण्डसहस्रयुग्ममुदितो द्वाभ्यां च गव्यूतिका ताभ्यां योजनमेव भूमिरखिला कोटिः शतं योजनैः।। ३. मापन के मूल में यव-मान प्रधान है। इससे अङ्गुल-माप प्राप्त होता है। सम- राङ्गणसूत्रधार एवं अपराजितपृच्छा में तीन प्रकार के—ज्येष्ठ, मध्यम एवं कनिष्ठ अङ्गुल माप प्राप्त होते हैं; जो आठ, सात एवं छः यवों से निर्मित होते हैं— (क) अष्टाभिः सप्तभिः षड्भिरङ्गुलानि यवोदरैः। ज्येष्ठमध्यकनिष्ठानि तच्चतुर्विंशतिः करः।। सोऽष्टभिः पर्वभिर्युक्तः करः कार्यों विजानता। करस्यार्धं चतुःपर्वं शेषं स्यात् भक्तमङ्गुलैः।। ( समराङ्गणसूत्रधार ९.५-६ ) (ख) ज्येष्ठं चाष्टयवैः प्रोक्तं मध्यमं सप्तभिर्यवैः। स्यात्कनिष्ठं षड्यवैस्तु चतुर्विंशतिभिः करैः।। ( अपराजितपृच्छा-४१.९ ) इसके अतिरिक्त अपराजितपृच्छा ( अ. ४१ ) में परमाणु, केशाग्र, लिक्षा, यूका एवं यव मान की चर्चा भी प्राप्त होती है। ४. विश्वकर्मवास्तुशास्त्र ( ७.७२-७७ ) में मान की चर्चा प्राप्त होती है। परमाणु मान के अतिरिक्त शालि, व्रीहि, अङ्गुल, वितस्ति, हस्त, धनुर्मुष्टि, दण्ड, नृपदण्ड एवं ब्रह्मदण्ड का वर्णन प्राप्त होता है— तस्मान्मानवमानन्तु प्रोच्यते फलदायि तत्। शालिव्रीहिस्तु सर्वत्र सिद्धमानोदयो मतः।।७३।। तैर्व्रीहिभिस्त्रिभिर्युक्तमङ्गुलं मानवं मतम्। द्वादशाङ्गुलसंयुक्तो वितस्तिरभिधीयते।।७४।। वितस्तिद्वयसंयुक्तं हस्तमानमुदीरितम्। हस्तमानद्वयोपेतो धनुर्मुष्टिरितीरिता।।७५।।
पञ्चमोऽध्यायः 卐 मानोपकरणम् २५ धनुर्मुष्टिद्वयोपेतो दण्ड इत्यभिधीयते। दण्डद्वयेन संयुक्तो नृपदण्ड इतीरितः।।७६।। नृपदण्डद्वयोपेतो ब्रह्मदण्ड इति स्मृतः। इत्यादि बहुधा मानं शास्त्रेषूक्तं मनीषिभिः।।७७।। ५. मानसार (२.२०-२६) में परमाणु, रथधूलि, वालाग्र, लिक्षा, यूका एवं यव की चर्चा प्राप्त होती है। छः, सात एवं आठ यव के माध्यम से कनिष्ठ, मध्यम एवं उत्तम अङ्गुल-मान प्राप्त होता है। अङ्गुल-मान से वितस्ति, किष्कु, हस्त, धनुर्ग्रह, धनुर्दण्ड, रज्जु आदि मान प्राप्त होते हैं। यवमान से प्राप्त मान इस प्रकार हैं— मानमात्रं त्रिधा प्रोक्तं यववृद्धिविशेषतः। षट्सप्ताष्टयवैरेतत्कनिष्ठो मध्यमोत्तमम्।।२४।। अङ्गुलैर्द्वादशभिर्युक्तं वितस्तिः परिकीर्तितम्। वितस्तियुग्मं किष्कुः स्यात्प्राजापत्योऽङ्गुलाधिका।।२५।। षड्विंशत्यङ्गुलो हस्तो धनुर्मुष्टिरिति स्मृतम्। सप्तविंशतिकाङ्गुल्यं हस्तमुक्तं धनुर्ग्रहः।।२६।। चतुर्हस्तं धनुर्दण्डं दण्डाष्टं रज्जुमेव च।।२७।। ६. शिल्परत्न (२.१-१६) में भी मान का वर्णन किया गया है। यहाँ परमाणु, त्रसरेणु, बालाग्र, लिक्षा, जूका, यवमान प्राप्त होता है। छः, सात एवं आठ यवमान से अङ्गुलमान तथा शाली-मान से अङ्गुलमान की चर्चा की गई है। मात्राङ्गुल से मुष्टि, वितस्ति, किष्कु, कर, प्राजापत्य, धनुर्मुष्टि, चापग्रह, वैदेहक, वैपुल्य आदि करभेद, दण्ड, क्रोश, योजन, वंश, रज्जु, गजदण्ड, अरत्नि, अरणि, प्रादेश, ताल, गोकर्ण आदि मानों का वर्णन प्राप्त होता है। शिल्पिलक्षण (श्लोक-१३-२४) अन्य वास्तुग्रन्थों में स्थपति, सूत्रधार आदि शिल्पियों के लक्षण इस प्रकार प्राप्त होते हैं— १. समराङ्गणसूत्रधार (४४.१-२२) में स्थपति की विशेषताओं की विस्तार से चर्चा प्राप्त होती है। इसके अनुसार इसे शास्त्र, कर्म, प्रज्ञा से एवं शील से युक्त होना चाहिये। शास्त्रों में इसे सामुद्रिक, गणित, ज्योतिष, छन्द, सिरा, शिल्प एवं यन्त्रकर्म का ज्ञाता होना चाहिये— शास्त्रं कर्म तथा प्रज्ञा शीलं च क्रिययान्वितम्। लक्ष्यलक्षणयुक्तार्थशास्त्रनिष्ठो नरो भवेत्।।२।।
२६ मयमतम् सामुद्रं गणितं चैव ज्योतिषं छन्द एव च। सिराज्ञानं तथा शिल्पं यन्त्रकर्मविधिस्तथा।।३।। एतान्यङ्गानि जानीयाद्वास्तुशास्त्रस्य बुद्धिमान्।।४।। इसको शास्त्र के साथ कार्य का भी ज्ञान होना चाहिये— यस्तु केवलशास्त्रज्ञः कर्मस्वपरिनिष्ठितः।।८।। स मुह्यति क्रियाकाले दृष्ट्वा भीरुरिवाहवम्। केवलं कर्म यो वेत्ति शास्त्रार्थं नाधिगच्छति।।९।। सोऽचक्षुरिव नीयेत विवशोऽन्येन वर्त्मसु।।१०।। स्थपति का शीलवान होना अत्यावश्यक चारित्रिक गुण है— ज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः।।१६।। २. राजवल्लभमण्डन (१.४१) में भी उपर्युक्त मत की पुष्टि प्राप्त होती है— सुशीलः चतुरो दक्षः शास्त्रज्ञो लोभवर्जितः। क्षमायुक्तो द्विजश्चैव सूत्रधारः स उच्यते।। ३. मनुष्यालयचन्द्रिका (१.११-१३) में स्थपति, सूत्रग्राही, तक्षक एवं वर्धक संज्ञक शिल्पियों के लक्षण इस प्रकार प्राप्त होते हैं— चतुर्धा कारवः— स्थपतिः सूत्रग्राही तक्षकसंज्ञश्च वर्धकिः क्रमशः। स्वोचितकर्मणि दक्षा ग्राह्यास्ते कारवश्चतुर्धैति।।११।। स्थपतिः— सर्वशास्त्रविहितक्रियापटुः सर्वदावहितमानसः शुचिः। धार्मिको विगतमत्सरादिको यः स च स्थपतिरस्तु सत्यवाक्।।१२।। अन्ये कारवः— जानीयात् स्थापनार्हं स्थपतिमथ गुणैः प्रायशस्तेन तुल्यः सूत्रग्राही सुतो वा स्थपतिमतिगतिप्रेक्षकः शिष्यको वा। स्थूलानां तक्षणात्तक्षक इति कथितः सन्ततं हृष्टचित्तो दार्वद्यन्योऽन्यसम्मेलनपटुरुदितो वर्धकिः सावधानः।।१३।। ४. मानसार (२.१-१७) में स्थपतियों के उद्भव, उनके प्रकार, उनके वैशिष्ट्य आदि सभी पर अत्यन्त विस्तार से चिन्तन किया गया है। प्रथम स्थपति इस सृष्टि के सर्जक 'महाविश्वकर्मा' थे—
पञ्चमोऽध्यायः 卐 मानोपकरणम् २७ परः शिवसकाशाद्धि ब्रह्मा चेन्द्रोऽपि लोककृत्।।१।। स महाविश्वकर्मेति त्वीश्वरेणैव कीर्तितः। स एवायं विश्वकर्मा ब्रह्माण्डं सृजते मुहुः।।२।। इस विश्वकर्मा के चार मुख थे। पूर्व दिशा के मुख का नाम विश्वभू, दक्षिणमुख विश्वविद्, उत्तरमुख विश्वस्थ एवं पश्चिममुख विश्वस्रष्टा था— विश्वभूरिति नामैतत्पूर्ववक्त्रं प्रकीर्तितम्। दक्षिणे विश्वविद्वक्त्रं विश्वस्थश्च तथोत्तरे।।४।। पश्चिमे विश्वस्रष्टाख्यं वक्त्रमेवं चतुर्विधम्। एतेभ्यः प्रथमो जातो विश्वकर्माचतुष्टयः।।५।। इनसे चार कारवों ( स्थपतियों, विश्वकर्माचतुष्टय )—विश्वकर्मा, मय, त्वष्टा एवं मनु की उत्पत्ति हुई। ये चारो क्रमशः इन्द्र, सुरेन्द्र, वैश्रवण एवं नल के पुत्र ( २.७-८ ) कहे गये— पूर्वानने विश्वकर्मा जायते दक्षिणे मयः। उत्तरस्य मुखे त्वष्टा पश्चिमे तु मनुः स्मृतः।।६।। विश्वकर्मा के पुत्र को स्थपति, मय के पुत्र को सूत्रग्राही, त्वष्टा के पुत्र को वर्धकी एवं मनु के पुत्र को तक्षक कहा गया है— विश्वकर्माख्यानाम्नोऽस्य पुत्रः स्थपतिरुच्यते। मयस्य तनयः सूत्रग्राहीति परिकीर्तितः।।९।। त्वष्टुर्देव-ऋषेः पुत्रो वर्धकीरिति प्रकथ्यते। मनोः पुत्रस्तक्षकः स्यात्स्थपत्यादिचतुष्टयम्।।१०।। इनमें स्थपति को सभी शास्त्रों का ज्ञाता, सूत्रग्राही को मानसूत्र धारण करने वाला, वर्धकी को मानकर्म का ज्ञाता एवं तक्षक को छीलने-काटने का विशेषज्ञ कहा गया है— स्थपतिः सर्वशास्त्रज्ञः सूत्रग्राहीति सूत्रधृत्।।१२।। वर्धकीर्मानकर्मज्ञः तक्षणात्तक्षकः स्मृतः।।१३।। ५. वास्तुविद्या ( १.१२-२० ) में चारो स्थपति आदि का लक्षण इस प्रकार प्राप्त होता है— स्थपति— स्थपतिः स्थापनार्हः स्यात्सर्वशास्त्रविशारदः। न हीनाङ्गोऽतिरिक्ताङ्गो धार्मिकस्तु दयापरः। अमात्सर्योऽनसूयश्च तान्त्रिकस्त्वभिजातवान्।।१३।।
२८ मयमतम् गणितज्ञः पुराणज्ञः आनन्दात्माप्यलुब्धकः। चित्रज्ञः सर्वदेशज्ञः सत्यवादी जितेन्द्रियः ।।१४।। अरोगी चाप्रमादी च सप्तव्यसनवर्जितः । सुनामा दृढबन्धुश्च वास्तुविद्याब्धिपारगः ।।१५।। सूत्रग्राही— स्थपतेस्तस्य शिष्यो वा सूत्रग्राही सुतोऽथवा। स्थपत्याज्ञानुसारी च सर्वकर्मविशारदः ।।१६।। सूत्रदण्डप्रमाणज्ञो मानोन्मानप्रमाणवित् । तक्षितानां तक्षकेणाप्युपर्य्युपरि युक्तितः ।।१७।। वर्धकी ( वर्धकि )— वृद्धिकृद् वर्धकिः प्रोक्तः सूत्रग्राह्यनुगः सदा ।।१८।। तक्षक— तक्षणात्स्थूलसूक्ष्माणां तक्षकः स तु कीर्तितः ।।१८।। मृत्कर्मज्ञो गुणी शक्तः सर्वकर्मस्वतन्त्रकः । गुरुभक्तः सदा हृष्टः स्थपत्याद्यनुगः सदा ।।१९।। शिल्परत्न ( १.२९-३३ ) में वर्णित स्थपति, सूत्रग्राही, तक्षक एवं वर्धकी के लक्षण वास्तुविद्या में वर्णित लक्षणों के ही सदृश हैं।
अथ षष्ठोऽध्यायः ( दिक्परिच्छेदः ) वक्ष्येऽहं दिक्परिच्छेदं शङ्कुनार्कोदये सति । उत्तरायणमासे तु शुक्लपक्षे शुभोदये ॥१॥ दिशा-निर्धारण—मैं ( मय ) दिशा के निर्धारण के विषय में कहता हूँ। यह कार्य उत्तरायण मास में शुभ शुक्ल पक्ष में सूर्योदय होने पर शङ्कु द्वारा करना चाहिये।।१।। प्रशस्तपक्षनक्षत्रे विमले सूर्यमण्डले । गृहीतवास्तुमध्ये तु समं कृत्वा भुवः स्थलम् ॥२॥ शुभ पक्ष एवं नक्षत्र में सूर्यमण्डल के निर्मल रहने पर ग्रहण किये गये वास्तु के मध्य की भूमि को समतल करना चाहिये।।२।। जलेन दण्डमात्रेण समं तु चतुरस्रकम् । जिस स्थान पर शङ्कुस्थापन करना हो, उस स्थान से चारो दिशाओं में दण्डप्रमाण से चौकोर किये गये भूखण्ड को जल द्वारा समतल करना चाहिये।। ✺ शङ्कुलक्षणम् ✺ तन्मध्ये स्थापयेच्छङ्कं तन्मानमधुनोच्यते ॥३॥ उस समतल भूमि के मध्य में शङ्कुस्थापन करना चाहिये। अब शङ्कु के प्रमाण का वर्णन किया जा रहा है।।३।। अरत्निमात्रमायाममग्रमेकाङ्गुलं भवेत् । मूलं पञ्चाङ्गुलं व्यासं सुवृत्तं निर्व्रणं वरम् ॥४॥ शङ्कु का लक्षण इस प्रकार है—यह एक हाथ लम्बा हो, शीर्ष पर इसका माप एक अङ्गुल हो तथा मूल भाग में इसका व्यास पाँच अङ्गुल हो। इसकी गोलाई सुन्दर हो, किसी प्रकार का इसमें व्रण न हो अर्थात् इसका काष्ठ कटा-फटा न हो एवं श्रेष्ठ हो।।४।। अष्टादशाङ्गुलं मध्यं कन्यसं द्वादशाङ्गुलम् । आयामसदृशं नाहं मूलेऽग्रे तु नवाङ्गुलम् ॥५॥
३० मयमतम् ( उपर्युक्त माप उत्तम शङ्कुमान का है। ) मध्यम शङ्कु अट्ठारह अङ्गुल लम्बा एवं कनिष्ठ शङ्कु बारह या नौ अङ्गुल लम्बा होता है। लम्बाई के समान ही इसका मूल एवं अग्र भाग में भी माप रखना चाहिये॥५॥ दन्तं वै चन्दनं चैव खदिरः कदरः शमी। शाकश्च तिन्दुकश्चैव शङ्कुवृक्षा उदीरिताः ॥६॥ दन्त ( मौलसिरी ), चन्दन, खैर या कत्था, कदर, शमी, शाक ( सागौन ) एवं तिन्दुक ( तेंन्दू ) के वृक्ष शङ्कु-वृक्ष कहलाते हैं अर्थात् इनके काष्ठ से शङ्कुनिर्माण करना चाहिये॥६॥ अन्यैः सारद्रुमैः प्रोक्तं तस्याग्रं चित्रवृत्तकम्। शङ्कुं कृत्वा दिनादौ तु स्थापयेदात्तभूतले ॥७॥ इनके अतिरिक्त कठोर काष्ठ वाले वृक्षों से भी शङ्कु-निर्माण किया जा सकता है। शङ्कु का अग्र भाग चित्रवृत्तक ( दोषहीन गोलाई ) होना चाहिये। शङ्कु-निर्माण के पश्चात् प्रातःकाल भूतल के पूर्व निर्धारित स्थल पर उसे स्थापित करना चाहिये॥७॥ शङ्कुद्विगुणमानेन तन्मध्ये मण्डलं लिखेत्। पूर्वापराह्नयोश्छाया यदि तन्मण्डलान्तगा ॥८॥ शङ्कु-प्रमाण का दुगुना माप लेकर शङ्कु को केन्द्र बना कर वृत्त खींचना चाहिये। दिन के पूर्वाह्न एवं अपराह्न में उस मण्डलाकृति पर शङ्कु की छाया पड़ती है॥८॥ तद्विन्दुद्वयगं सूत्रं पूर्वापरदिशीष्यते। बिन्दुद्वयान्तरभ्रान्तशफराननपुच्छगम् ॥९॥ उपर्युक्त छायायें जिन-जिन बिन्दुओं पर पड़ती हैं, उन बिन्दुओं को सूत्र से मिलाना चाहिये। इससे पूर्व एवं पश्चिम दिशा का ज्ञान होता है ( पूर्वाह्न में जहाँ छाया पड़ती है, वह पश्चिम दिशा एवं अपराह्न में जहाँ छाया पड़ती है, वह पूर्व दिशा होती है )। पूर्वोक्त बिन्दुओं को केन्द्र बनाकर मछली की आकृति बनानी चाहिये॥९॥ दक्षिणोत्तरगं सूत्रमेवं सूत्रद्वयं न्यसेत्। उदगाद्यपरान्तानि पर्यन्तानि विनिक्षिपेत् ॥१०॥ दो सूत्रों को बिन्दुओं के केन्द्र में इस प्रकार रखना चाहिये कि वे दक्षिण से उत्तर तक जायें। इसी प्रकार दूसरे सूत्र को उत्तर से दक्षिण तक ले जाना चाहिये। कहने का तात्पर्य यह है कि एक बिन्दु को केन्द्र बनाकर चाप की आकृति उत्तर से दक्षिण तक बनानी चाहिये। पुनः दूसरे बिन्दु को केन्द्र बनाकर दूसरी चापाकृति
षष्ठोऽध्यायः 卐 दिक्परिच्छेदः ३१ बनानी चाहिये। मण्डल के दो छोरों पर ये चापाकृतियाँ एक-दूसरे को काटती हैं। इस प्रकार मत्स्य की आकृति बनती है।।१०।। सूत्राणि स्थपतिः प्राज्ञः प्रागुत्तरमुखानि च । इन सूत्रों से बुद्धिमान स्थपति उत्तर एवं दक्षिण दिशा का निर्धारण करते हैं। ( पूर्व के बाँयीं ओर उत्तर दिशा एवं दाहिनी ओर दक्षिण दिशा होती है। इस प्रकार भूमि में दिशा का ज्ञान होता है )। ☀ अपच्छाया ☀ कन्यायां वृषभे राशावपच्छायात्र नास्ति हि ॥११॥ अशुद्ध छाया—जब सूर्य कन्या या वृषभ राशि में होता है, उस समय सूर्य की अपच्छाया नहीं पड़ती है ( अर्थात् इस स्थिति में शङ्कु की छाया सीधे पूर्व और पश्चिम दिशा पर पड़ती है ) ।।११।। विशेष—सूर्य की छाया बारहों महीनों में एक समान नहीं होती है। अतः सूर्य के नक्षत्रों के सङ्क्रमण के अनुसार शुद्ध रूप से पूर्व एवं पश्चिम का निर्धारण किस प्रकार किया जाय एवं अपच्छाया से बचा जाय, इसका उपाय आगे के श्लोकों में वर्णित है। मेषे च मिथुने सिंहे तुलायां द्व्यङ्गुलं नयेत्। कुलीरे वृश्चिके मत्स्ये शोधयेच्चतुरङ्गुलम् ॥१२॥ मेष, मिथुन, सिंह एवं तुला राशि में सूर्य के रहने पर जहाँ शङ्कु की छाया पड़े, उससे दो अङ्गुल पीछे हट कर पूर्व एवं पश्चिम का निर्धारण करना चाहिये। जिस समय सूर्य कर्क, वृश्चिक एवं मीन राशि पर हों, उस समय चार अङ्गुल हट कर दिशानिर्धारण करना चाहिये।।१२।। धनुःकुम्भे षडङ्गुल्यं मकरेऽष्टाङ्गुलं तथा। छायाया दक्षिणे वामे नीत्वा सूत्रं प्रचारयेत् ॥१३॥ धनु एवं कुम्भ पर सूर्य के रहने पर छः अङ्गुल एवं मकर पर आठ अङ्गुल हट कर शङ्कु की छाया के दाहिने एवं बाँयें सूत्र का प्रयोग करना चाहिये।।१३।। ☀ रज्जुलक्षणम् ☀ अष्टयष्ट्यायता रज्जुस्तालकेतकवल्कलैः । कार्पासपट्टसूत्रैश्च दर्भैर्न्यग्रोधवल्कलैः ॥१४॥ माप - सूत्र का लक्षण—रज्जु अथवा सूत्र को आठ दण्ड लम्बा होना चाहिये।
३२ मयमतम् इसका निर्माण ताल, केतक के रेशे, कपास, कुश अथवा न्यग्रोध ( बरगद ) के छाल से होना चाहिये ।।१४।। अङ्गुलाग्रसमस्थूला त्रिवर्तिर्ग्रन्थिवर्जिता । देवद्विजमहीपानां शेषयोश्च द्विवर्तिका ॥१५॥ देवता, ब्राह्मण एवं राजा ( क्षत्रिय ) के वास्तु-मापन के लिये रज्जु को अङ्गुल के अग्र भाग के बराबर मोटा, तीन बत्तियों से निर्मित एवं विना गाँठ का बनाना चाहिये। वैश्य एवं शूद्र के लिये रज्जु दो बत्तियों से बँटा होना चाहिये।।१५।। ✵ खातशङ्कुलक्षणम् ✵ खदिरः खादिरश्चैव मधूकः क्षीरिणी तथा। खातशङ्कुद्रुमाः प्रोक्ता अन्यं वा सारदारुजम् ॥१६॥ गड्ढे में गाड़े जाने वाले शङ्कु का लक्षण—गड्ढे में गाड़े जाने वाले शङ्कु जिन वृक्षों के काष्ठ से बनते हैं, उनके नाम हैं—खदिर, खादिर, महुआ, क्षीरिणी तथा अन्य कठोर काष्ठ वाले वृक्ष।।१६।। एकादशाङ्गुलाद्येकविंशन्मात्रं तु दैर्घ्यतः । पूर्णमुष्टिस्तु नाहं स्यान्मूलं सूचीनिभं भवेत् ॥१७॥ इसकी लम्बाई ग्यारह अङ्गुल से लेकर इक्कीस अङ्गुल तक होनी चाहिये एवं व्यास एक मुट्ठी होना चाहिये। इसका मूल सूई की भाँति नुकीला होना चाहिये।।१७।। गृहीत्वा वामहस्तेन प्राङ्मुखो वाप्युदङ्मुखः । दक्षिणेनाष्ठीलं गृह्य ताडयेदष्टभिः क्रमात् ॥१८॥ प्रहारैः स्थपतिः प्राज्ञस्तत् कुर्यात् स्थापकाज्ञया । स्थपति पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके स्थापक की आज्ञा से बाँयें हाथ में खातशङ्कु लेकर एवं दाहिने हाथ में हथौड़ा लेकर क्रमशः आठ बार शङ्कु पर प्रहार करे।१८।। ✵ सूत्रविन्यासम् ✵ प्रमाणसूत्रमित्युक्तं प्रमाणैर्निश्चितं हि यत् ॥१९॥ सूत्र को भूमि पर फैलाना—चूँकि इस सूत्र से भवन-निर्माणसम्बन्धी कार्य में प्रमाण या माप निश्चित किया जाता है; अतः इसे 'प्रमाणसूत्र' कहा जाता है।।१९।। तद्बहिः परितो भागे सूत्रं पर्यन्तमिष्यते । गर्भसूत्रादिविन्याससूत्रं देवपदोचितम् ॥२०॥
षष्ठोऽध्यायः 卐 दिक्परिच्छेदः ३३ पदविन्याससूत्रं हि विन्यासः सूत्रमिष्यते । प्रमाणसूत्र के कार्यक्षेत्र के बाहर के चारो ओर के क्षेत्र का जिससे मापन किया जाता है, उस सूत्र को 'पर्यन्त सूत्र' कहते हैं। जिस सूत्र से निश्चित स्थान का निर्धारण, देवताओं के पद का निर्धारण तथा वास्तुपद का विन्यास किया जाता है, उसे 'विन्यास- सूत्र' कहते हैं।।२०।। गृहाणां दक्षिणे गर्भस्तत्पार्श्वे सूत्रपातनम् ॥२१॥ गृह के दक्षिण भाग में गृह का गर्भ होता है, अतः उसी के पास से सूत्रपात प्रारम्भ करना चाहिये।।२१।। तत्सूत्राच्छङ्कुमानेन नीत्वा शङ्कुं निखानयेत् । उपानं निष्क्रमार्थं वा भित्त्यर्थं वाऽथ तद्भवेत् ॥२२॥ उस सूत्र से शङ्कु का मान लेते हुये शङ्कु को भूमि में गाड़ना चाहिये। इसी से प्रवेशमार्ग ( अथवा गृह से बाहर निकलने का मार्ग ) या भित्ति-निर्माण के लिये मापन करना चाहिये।।२२।। नगरग्रामदुर्गेषु वाय्वादी रज्जुपातनम् । अवाच्याशाद्युदीच्यन्तं प्राक्प्रत्यग्गतसूत्रकम् ॥२३॥ नगर, ग्राम एवं दुर्ग के मापन के लिये सर्वप्रथम सूत्रपात वायव्य कोण (उत्तर- पश्चिम ) में करना चाहिये। इसके पश्चात् दक्षिण से उत्तर तथा पूर्व से पश्चिम सूत्रपात करना चाहिये।।२३।। प्रतीच्याशादिपूर्वान्तं विसृजेद् दक्षिणोत्तरम् । ब्रह्मस्थानात् पूर्वगतं तत् त्रिसूत्रं तदुच्यते ॥२४॥ इसके पश्चात् पश्चिम से पूर्व एवं उत्तर से दक्षिण तक सूत्रप्रपात करना चाहिये। जिस सूत्र से ब्रह्मा के पद से प्रारम्भ कर पूर्व दिशा तक मापन किया जाता है, उसे 'त्रिसूत्र' कहते हैं।।२४।। ततो धनं पश्चिमगं धान्यं दक्षिणगं ततः । ब्रह्मस्थानादुत्तरगं सुखमित्यभिधीयते ॥२५॥ इसके पश्चात् ब्रह्मस्थान से पश्चिम की ओर जाने वाले सूत्र को 'धन', दक्षिण की ओर जाने वाले सूत्र को 'धान्य' एवं उत्तर की ओर जाने वाले सूत्र को 'सुख' कहते हैं।।२५।। सुखप्रमाणं यत् सूत्रं तत्प्रमाणमिहोच्यते । मय०-३
३४ मयमतम् एकहस्तं द्विहस्तं वा त्रिहस्तं परितोऽधिकम् । विमानं मण्डपव्यासात् खानयेत् तद्बलार्थकम् ॥२६॥ जिस सूत्र से सुखप्रमाण प्राप्त होता है, उसका माप यहाँ वर्णित है। बल के लिये केन्द्र के चारो ओर मण्डप के व्यास से एक हाथ, दो हाथ या तीन हाथ की दूरी लेते हुये उत्खनन करना चाहिये।।२६।। ❋ पुनरपच्छाया ❋ द्व्येकं नो नैकनेत्रे नयनगुणयुगं चाब्धिरुद्राक्षमक्षी नैत्रैकं नो न चन्द्रं नयननयनकं वह्निवेदाब्धिबाणम् । षट्षट्सप्ताष्टकाष्टैर्मुनिरसरसकं भूतवेदाब्ध्यजाक्षं नेत्रं मात्रञ्च मेषादिषु दशदशकेऽस्मिन्दिने त्यज्य युक्त्यात् ॥२७॥ पुनः दोषयुक्त छाया—पूर्व एवं पश्चिम के निर्धारण के लिये प्रत्येक माह प्रत्येक दस दिन के काल-खण्ड में संख्याओं का संयोजन इस प्रकार करना चाहिये—सूर्य का सङ्क्रमण मेष राशि में होने पर दो, एक, शून्य; वृष में होने पर शून्य, एक, दो; मिथुन में होने पर दो, तीन, चार; कर्क में होने पर चार, तीन, दो; सिंह में होने पर दो, एक, शून्य; कन्या में होने पर शून्य, एक, दो; तुला में होने पर दो, तीन, चार; वृश्चिक में होने पर चार, पाँच, छः; धनु में होने पर छः, सात, आठ; मकर में होने पर आठ, सात, छः; कुम्भ में होने पर छः, पाँच, चार तथा मीन में होने पर चार, तीन एवं दो।।२७।। समीक्ष्य भागौर्गमनं सराशिकं त्यजेत् पुरोक्ताङ्गुलिमन्त्रयुक्तितः । ततस्तु काष्ठादुपगृह्य तद्दशाद् विसृज्य सूत्रं विदधीत च स्थलम् ॥२८॥ इति मयमते वास्तुशास्त्रे दिक्परिच्छेदो नाम षष्ठोऽध्यायः राशि के साथ सूर्य की गति का विचार एवं युक्तिपूर्वक समीक्षा करते हुये पूर्वोक्त अङ्गुलियों को छोड़ देना चाहिये। इसके अनुसार सीमा एवं दिशा आदि का शङ्कु द्वारा ग्रहण करते हुये स्थान को तैयार करना चाहिये।।२८।।
षष्ठोऽध्यायः 卐 दिक्परिच्छेदः ३५ व्याख्यात्मक टिप्पणी दिशानिर्धारण ( श्लोक-१-२ ) दिशा-निर्धारण के सन्दर्भ में ज्योतिष-परक विचार अनेक वास्तु-ग्रन्थों में अत्यन्त विस्तार से प्राप्त होते हैं। इनमें मानसार ( अ. ५६ ) अजिताङ्गम (९), ईशानशिवगुरु- देवपद्धति ( क्रिया-२४.१.२४ ), विश्वकर्मवास्तुशास्त्र (३), अपराजितपृच्छा (६३), राजवल्लभमण्डन (१), मनुष्यालयचन्द्रिका (२), काश्यपशिल्प (१) आदि उल्लेखनीय ग्रन्थ हैं। शङ्कुलक्षण ( श्लोक-३-१० ) उपर्युक्त ग्रन्थों में दिशा-निर्धारण के सन्दर्भ में शङ्कु के काष्ठ, मान एवं आकृति का भी उल्लेख प्राप्त होता है। मयमत (६.७) में शङ्कु का शीर्षभाग चित्रवृत्तक ( गोला-कार ) कहा गया है। मानसार (६.८) में इसे छत्राकार कहा गया है— सुवृत्तं निर्व्रणं चैव छत्राकारं तदग्रकम्। अपच्छाया ( श्लोक ११-१३ ) सूर्य की राशियों पर सङ्क्रान्ति के अनुसार शङ्कु की छाया अलग-अलग स्थान पर पड़ती है। इससे सटीक पूर्व-पश्चिम दिशा का ज्ञान करना कठिन होता है। इन श्लोकों में सूर्य की राशियों पर सङ्क्रान्ति के अनुसार छाया पूर्व से कितना हट कर पड़ती है एवं कितने अङ्गुल छाया से हट कर सही दिशा प्राप्त होती है, इसका वर्णन किया गया है। इस प्रसङ्ग पर विचार विश्वकर्मवास्तुशास्त्र ( अ. ३ ), अपराजितपृच्छा ( अ. ६३ ), मनुष्यालयचन्द्रिका ( अ. २ ), मानसार ( अ. ६ ), काश्यपशिल्प ( अ. १ ) आदि ग्रन्थों में विस्तार से किया गया है।
अथ सप्तमोऽध्यायः ( पदविन्यासः ) वक्ष्येऽहं पदविन्यासं सर्ववस्तुसनातनम् । वास्तुपद-विन्यास—मैं ( मय ऋषि ) सभी वास्तुमण्डलों के पद-विन्यास का वर्णन करता हूँ। ✺ द्वात्रिंशत् पदानि ✺ सकलं पेचकं पीठं महापीठमतः परम् ॥१॥ उपपीठमुग्रपीठं स्थण्डिलं नाम चण्डितम् । मण्डूकपदकं चैव पदं परमशायिकम् ॥२॥ तथासनं च स्थानीयं देशीयोभयचण्डितम् । भद्रं महासनं पद्मगर्भं च त्रियुतं पदम् ॥३॥ व्रतभोगपदं चैव कर्णाष्टकपदं तथा । गणितं पादमित्युक्तं पदं सूर्यविशालकम् ॥४॥ सुसंहितपदं चैव सुप्रतीकान्तमेव च । विशालं विप्रगर्भं च विश्वेशं च ततः परम् ॥५॥ तथा विपुलभोगं च पदं विप्रतिकान्तकम् । विशालाक्षपदं चैव विप्रभक्तिकसंज्ञकम् ॥६॥ पदं विश्वेशसारं च तथैवेश्चरकान्तकम् । इन्द्रकान्तपदं चैव द्वात्रिंशत् कथितानि वै ॥७॥ बत्तीस प्रकार के पदविन्यास होते हैं। उनके नाम हैं—सकल, पेचक, पीठ, महापीठ, उपपीठ, उग्रपीठ, स्थण्डिलचण्डित, मण्डूक, परमशायिक, आसन, स्थानीय, देशीय, उभयचण्डित, भद्रमहासन, पद्मगर्भ, त्रियुत, व्रतभोग, कर्णाष्टक, गणित, सूर्यविशालक, सुसंहित, सुप्रतीकान्त, विशाल, विप्रगर्भ, विश्वेश, विपुलभोग, विप्रति- कान्त, विशालाक्ष, विप्रभक्तिक, विश्वेशसार, ईश्वरकान्त एवं इन्द्रकान्त॥१-७॥ सकलं पदमेकं स्यात् पेचकं तु चतुष्पदम् । पीठं नवपदं चैव महापीठं द्विरष्टकम् ॥८॥
सप्तमोऽध्यायः 卐 पदविन्यासः ३७ 'सकल' पदविन्यास एक पद से बनता है। 'पेचक' चार पद, 'पीठ' नौ पद एवं 'महापीठ' सोलह पद से बनते हैं।।८।। पञ्चविंशत्युपपीठं षट्षडेवोग्रपीठकम् । स्थण्डिलं सप्तसप्तांशं मण्डूकं चाष्टकाष्टकम् ।।९।। 'उपपीठ' का पदविन्यास पच्चीस पदों से, 'उग्रपीठ' छत्तीस पदों से, 'स्थण्डिल' उनचास पदों से एवं 'मण्डूक' चौसठ पदों से होता है।।९।। परमशायिपदं चैव नन्दनन्दपदं भवेत् । आसनं शतभागं स्यादेकविंशच्छतं पदम् ।।१०।। 'परमशायिक' इक्यासी पदों से एवं 'आसन' सौ पदों से बनता है। एक सौ इक्कीस पदों से—।।१०।। स्थानीयं स्याच्चतुश्चत्वारिंशच्छतपदाधिकम् । देशीयं नवषष्ट्यंशं शतं चोभयचण्डितम् ।।११।। 'स्थानीय' पदों की रचना होती है। 'देशीय' पदविन्यास एक सौ चौवालीस पदों से तथा 'उभयचण्डित' एक सौ उनहत्तर पदों से होता है।।११।। षण्णवत्यधिकं चैव शतं भद्रं महासनम् । सपञ्चविंशद् द्विशतं पद्मगर्भमिति स्मृतम् ।।१२।। 'भद्र-महासन' में एक सौ छियानबे पद होते हैं तथा 'पद्मगर्भ' में दो सौ पच्चीस पद होते हैं।।१२।। षडाधिक्यं तु पञ्चाशद्द्विशतं त्रियुतं पदम् । द्विशतं सनवाशीति व्रतभोगमिति स्मृतम् ।।१३।। 'त्रियुत' में दो सौ छप्पन पद होते हैं एवं 'व्रतभोग' में दो सौ नवासी पद होते हैं।।१३।। त्रिशतं च चतुर्विंशत् कर्णाष्टकपदं तथा । त्रिशतं चैकषष्ट्यंशं गणितं पादसंज्ञितम् ।।१४।। 'कर्णाष्टक' में तीन सौ चौबीस पद तथा 'गणित' वास्तु-पद में तीन सौ एकसठ पद होते हैं।।१४।। चतुःशतपदं सूर्यविशालं परिकीर्तितम् । सुसंहितपदं चैकचत्वारिंशच्चतुः शतम् ।।१५।।
३८ मयमतम् ‘सूर्यविशाल’ में चार सौ पद कहे गये हैं एवं ‘सुसंहित’ पद-विन्यास में चार सौ एकतालीस पद होते हैं।।१५।। सवेदाशीतिचत्वारः शतं सुप्रतिकान्तकम्। नवविंशत्यञ्चशतं विशालं पदमीरितम् ॥१६॥ ‘सुप्रतीकान्त’ में चार सौ चौरासी पद तथा ‘विशाल’ में पाँच सौ उन्तीस पद कहे गये हैं।।१६।। षट्सप्ततिः पञ्चशतं विप्रगर्भमिति स्मृतम्। विश्वेशं षट्शतं पश्चात् पञ्चविंशत्पदं स्मृतम् ॥१७॥ ‘विप्रगर्भ’ पदविन्यास पाँच सौ छिहत्तर तथा ‘विश्वेश’ छः सौ पच्चीस पदों में निर्मित होते हैं।।१७।। षट्सप्ततिः षट्शतकं विपुलभोगमिति स्मृतम्। नवविंशतिकं सप्तशतं विप्रतिकान्तकम् ॥१८॥ ‘विपुलभोग’ में छः सौ छिहत्तर एवं ‘विप्रतिकान्त’ में सात सौ उन्तीस पद होते हैं।।१८।। विशालाक्षपदं वेदाशीतिः सप्तशताधिकम्। सैकाष्टपञ्चयुक्तं चाष्टशतं विप्रभक्तिकम् ॥१९॥ ‘विशालाक्ष’ में सात सौ चौरासी पद तथा ‘विप्रभक्तिक’ में आठ सौ इकतालीस पद होते हैं।।१९।। विश्वेशसारमित्युक्तमेवं नवशतं पदम्। सैकषष्ट्यां नवशतं पदमीश्वरकान्तकम् ॥२०॥ ‘विश्वेशसार’ में नौ सौ पद एवं ‘ईश्वरकान्त’ में नौ सौ इकसठ पद होते हैं।।२०।। चतुर्विंशतिसंयुक्तं सहस्त्रपदसंकुलम्। इन्द्रकान्तमिति प्रोक्तं तन्त्रविद्भिः पुरातनैः ॥२१॥ ‘इन्द्रकान्त’ पदविन्यास में एक हजार चौबीस पद होते हैं। ये तन्त्रशास्त्र के प्राचीन विद्वानों के मत हैं।।२१।। ✺ सकलम् ✺ आद्यं पदं सकलमेकपदं यतीना- मिष्टं हि विष्टरमहाशनवह्निकार्यम्।
सप्तमोऽध्यायः 卐 पदविन्यासः ३९ पित्र्यामरादियजनं गुरुपूजनं च भान्वार्कितोयशशिनामकसूत्रयुक्ते ॥२२॥ प्रथम वास्तुपद-विन्यास में केवल एक पद होता है। यह यतियों के लिये अनुकूल होता है। इसमें अग्निकार्य होता है एवं इसमें कुश बिछाया जाता है। इस पर पितृपूजन, देवपूजन एवं गुरुपूजन का कार्य सम्पन्न होता है। इसके चारो ओर खींची गई रेखायें भानु, अर्कि, तोय एवं शशि कहलाती हैं॥२२॥ ✺ पेचकम् ✺ पैशाचभूतसविषग्रहरक्षकास्ते पूज्या हि पेचकपदे चतुरंशयुक्ते। तस्मिन् विधेयमधुना विधिना विधिज्ञैः शैवं तु निष्कलमलं सकलञ्च युक्त्या ॥२३॥ पेचकसंज्ञक पद-विन्यास में चार पद होते हैं। इसमें पिशाच, भूत, विषग्रह एवं राक्षसों की पूजा होती है। विधियों के ज्ञाता विधिपूर्वक इस प्रकार के कार्यों के लिये इस पदविन्यास को बनाते हैं एवं इसमें सभी विधियों का पालन करते हुये निर्मल एवं निष्कल शिव को प्रतिष्ठित करते हैं॥२३॥ ✺ पीठम् ✺ अथ पीठपदे नवभागयुते दिशि दिश्यथ वेदचतुष्टयकम्। विदुरीशपदाद्युदकं दहनं गगनं पवनं पृथिवी ह्यबहिः ॥२४॥ पीठसंज्ञक पद-विन्यास में नौ पद होते हैं। इसके चारो दिशाओं में चारो वेद, ईशान आदि (कोणों) में क्रमशः उदक (जल), दहन (अग्नि), गगन (आकाश) एवं पवन (वायु) होते हैं तथा मध्य में पृथिवी होती है॥२४॥ ✺ महापीठम् ✺ षोडशांशं महापीठं पञ्चपञ्चामरान्वितम्। ईशो जयन्त आदित्यो भृशोऽग्निर्वितथो यमः ॥२५॥ महापीठ पद-विन्यास में सोलह पद होते हैं एवं इसमें पच्चीस देवता होते हैं। इन पदों में (ईशान कोण से प्रारम्भ कर क्रमशः) देवता इस प्रकार होते हैं—ईश, जयन्त, आदित्य, भृश, अग्नि, वितथ, यम॥२५॥ भृङ्गश्च पितृसुग्रीवौ वरुणः शोषमारुतौ। मुख्यः सोमोऽदितिश्चेति बाह्यदेवाः प्रकीर्तिताः ॥२६॥
४० मयमतम् भृङ्ग, पितृ, सुग्रीव, वरुण, शोष, मारुत, मुख्य, सोम एवं अदिति बाह्य पदों के देवता कहे गये हैं।।२६।। आपवत्सार्यसावित्रा विवस्वानिन्द्रमित्रकौ । रुद्रजो भूधरश्चान्तर्मध्ये ब्रह्मा स्थितः प्रभुः ॥२७॥ अन्दर के पदों के देवता आपवत्स, आर्य, सावित्र, विवस्वान्, इन्द्र, मित्र, रुद्रज एवं भूधर हैं। केन्द्र में ब्रह्मा स्थित होते हैं, जो सबके स्वामी कहे गये हैं।।२७।। ✺ उपपीठादि ✺ तत्पार्श्वयोर्द्वयोरेकभागेनैकेन वर्धनात् । उपपीठं भवेदत्र देवतास्ताः पदे स्थिताः ॥२८॥ उपपीठ वास्तु-विन्यास में वे ( पूर्वोक्त ) देवता अपने पदों के अतिरिक्त अपने दोनों पाश्र्वों में एक-एक पद की वृद्धि प्राप्त करते हुये स्थित होते हैं।।२८।। तत्तत्पार्श्वद्वयोश्चैवमेकैकांशविवर्धनात् । इन्द्रकान्तपदं यावत्तावद्युञ्जीत बुद्धिमान् ॥२९॥ बुद्धिमान् ( स्थपति ) को चाहिये कि उन देवों के दोनों पाश्र्वों में एक-एक पद की वृद्धि तब तक करे, जब तक इन्द्रकान्त पद न बन जाय।।२९।। समानि यानि भागानि चतुःषष्ठिदाचरेत् । असमान्यपि सर्वाणि चैकाशीतिपदोक्तवत् ॥३०॥ जिन वास्तु-विन्यासों में सम संख्या में पद हों, उन्हें चौंसठ पद वाले वास्तु के समान एवं विषम संख्या में पद हों तो इक्यासी पद वाले वास्तु के समान ( देवों को ) रखना चाहिये।।३०।। पदानामपि सर्वेषां मण्डूकं चापि तत्परम् । चण्डितं सर्ववस्तूनामाह्रत्यं च यतस्ततः ॥३१॥ सभी वास्तु-विन्यासों में मण्डूकसंज्ञक वास्तुपद-विन्यास सभी निर्माण-कार्यों के लिये उपयुक्त होता है; क्योंकि यह ( तान्त्रिक ) विधि पर आधारित होता है।।३१।। तस्मात् संक्षिप्य तन्त्रेभ्यो वक्ष्येऽहमपि तद् द्वयम् । चतुःषष्टिपदे चैकाशीतौ सकलनिष्कले ॥३२॥ इसलिये मैं ( मय ऋषि ) तन्त्रों से संक्षेप में विषय ग्रहण कर सकल एवं निष्कल चौंसठ एवं इक्यासी दो पदविन्यासों का वर्णन करता हूँ।।३२।। सूत्रे च पदमध्ये च ब्रह्माद्याः स्थापिताः सुराः । प्रागुदग्दिक्समारभ्यैवोच्यन्ते देवताः पृथक् ॥३३॥
सप्तमोऽध्यायः 卐 पदविन्यासः ४१ ( उपर्युक्त दोनों पदविन्यासों में ) वास्तुपद के मध्य में ब्रह्मा आदि देवता स्थापित किये जाते हैं। ईशान कोण से प्रारम्भ कर पृथक्-पृथक् स्थापित किये जाने वाले देवता का यहाँ वर्णन किया जा रहा है।।३३।। ✺ दैवतस्थानानि ✺ ईशानश्चैव पर्जन्यो जयन्तश्च महेन्द्रकः। आदित्यः सत्यकश्चैव भृशश्चैवान्तरिक्षकः ॥३४॥ वास्तुदेवों के स्थान—( ईशान कोण से प्रारम्भ करते हुये देवता इस प्रकार हैं— ) ईशान, पर्जन्य, जयन्त, महेन्द्रक, आदित्य, सत्यक, भृश तथा अन्तरिक्ष।।३४।। अग्निः पूषा च वितथो राक्षसश्च यमस्तथा। गन्धर्वो भृङ्गराजश्च मृषश्च पितृदेवताः ॥३५॥ ( आग्नेय कोण से नैर्ऋत्य कोण के देवता इस प्रकार हैं— ) अग्नि, पूषा, वितथ, राक्षस, यम, गन्धर्व, भृङ्गराज, मृष तथा पितृदेवता।।३५।। दौवारिकश्च सुग्रीवः पुष्पदन्तो जलाधिपः। असुरः शोषरोगौ च वायुर्नगस्तथैव च ॥३६॥ ( पश्चिम से वायव्य तक तथा उत्तर के देवता इस प्रकार हैं— ) दौवारिक, सुग्रीव, पुष्पदन्त, जलाधिप ( वरुण ), असुर, शोष, रोग, वायु एवं ( उत्तर दिशा में ) नाग।।३६।। मुख्यो भल्लाटकश्चैव सोमश्चैव मृगस्तथा। अदितिश्शोदितिश्चैव द्वात्रिंशद् बाह्यदेवताः ॥३७॥ ( उत्तर दिशा के देवता हैं— ) मुख्य, भल्लाटक, सोम, मृग, अदिति एवं उदिति—ये बत्तीस बाह्य पदों के देवता हैं।।३७।। आपश्चैवापवत्सश्चैवान्तः प्रागुत्तरे स्मृतौ । सविन्द्रश्चैव साविन्द्रश्चान्तः प्राग्दक्षिणे स्मृतौ ॥३८॥ अन्तःदेवों में पूर्वोत्तर ( ईशान ) में आप एवं आपवत्स देवता तथा पूर्व-दक्षिण ( आग्नेय कोण ) में सविन्द्र एवं साविन्द्र देवता होते हैं।।३८।। इन्द्रश्चैवेन्द्रराजश्च दक्षिणापरतः स्थितौ । रुद्रो रुद्रजयश्चैव पश्चिमोत्तरतो दिशि ॥३९॥ दक्षिण-पश्चिम ( नैर्ऋत्य कोण ) में इन्द्र एवं इन्द्रराज तथा पश्चिमोत्तर ( वायव्य कोण ) में रुद्र एवं रुद्रजय देवता कहे गये हैं।।३९।।
४२ मयमतम् ब्रह्मा मध्ये स्थितः शम्भुस्तन्मुखस्थाश्चतुःसुराः । आर्यो विवस्वान् मित्रश्च भूधरश्चैव कीर्तिताः ॥४०॥ मध्य में स्थित ब्रह्मा शम्भु हैं तथा आर्य, विवस्वान्, मित्र एवं भूधर—ये चार देवता उनकी ओर मुख करके स्थित होते हैं॥४०॥ चरकी च विदारी च पूतना पापराक्षसी । ईशानादि बहिः स्थाप्याश्चतुष्कोणे स्त्रियः स्मृताः । नपदा बलिभोक्तारः शेषाणां पदमुच्यते ॥४१॥ ईशान आदि चारो कोणों के बाहर क्रमशः चार स्त्री-देवताओं—चरकी, विदारी, पूतना एवं पापराक्षसी की स्थापना होनी चाहिये। ये चारो विना पद के ही बलि (वास्तु के निमित्त हविष् ) ग्रहण करती हैं। शेष देवों का पद कहा गया है॥४१॥ विंशत्सूत्रैः सन्धिभिः सप्तवेदैः षट्षट्संख्याभिश्चतुष्कैश्र षट्कैः । अर्कैः शूलैर्वेदसंख्याः सिराभिः संयुक्तं स्यादष्टकेनैकमेतत् ॥४२॥ इस प्रकार इकयासी संख्याओं का एक पद वास्तुचक्र में मण्डलदेवताओं का होता है, जिसका विवरण अग्रलिखित है—२० + ७ + ६ + ६ + ६ + ६ + ६ + १२ + ४ + ८ = ८१ अर्थात् खड़ी और पड़ी दश-दश रेखायें होने से इकयासी पद का वास्तुचक्र सम्पन्न होता है॥४२॥ ❋ मण्डूकपदम् ❋ चतुःषष्टिपदे मध्ये ब्रह्मणश्च चतुष्पदम् ॥४३॥ चौंसठ पद वाले मण्डूक पद में मध्य के चार पद में ब्रह्मा होते हैं॥४३॥ आर्यकादिचतुर्देवाः प्रागादित्रित्रिभागिनः । आपाद्यष्टामराः कोणेष्वर्धार्धपदभागिनः ॥४४॥ (ब्रह्मा के पश्चात् उनके चारो ओर ) आर्यक आदि चार देवता ( आर्य, विवस्वान्, मित्र, भूधर ) पूर्व से आरम्भ होकर तीन-तीन पद में स्थित होते हैं। आप आदि आठ देवता ( आप, आपवत्स, सविन्द्र, साविन्द्र, इन्द्र, इन्द्रराज, रुद्र एवं रुद्रजय ) ब्रह्मा के चारो कोणों में आधे-आधे पद में प्रतिष्ठित होते हैं॥४४॥ महेन्द्रराक्षसाद्याश्च पुष्पभल्लाटकादयः । दिशि दिश्यथ चत्वारो देवा द्विपदभोगिनः ॥४५॥