भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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सप्तमोऽध्यायः 卐 पदविन्यासः ३९ पित्र्यामरादियजनं गुरुपूजनं च भान्वार्कितोयशशिनामकसूत्रयुक्ते ॥२२॥ प्रथम वास्तुपद-विन्यास में केवल एक पद होता है। यह यतियों के लिये अनुकूल होता है। इसमें अग्निकार्य होता है एवं इसमें कुश बिछाया जाता है। इस पर पितृपूजन, देवपूजन एवं गुरुपूजन का कार्य सम्पन्न होता है। इसके चारो ओर खींची गई रेखायें भानु, अर्कि, तोय एवं शशि कहलाती हैं॥२२॥ ✺ पेचकम् ✺ पैशाचभूतसविषग्रहरक्षकास्ते पूज्या हि पेचकपदे चतुरंशयुक्ते। तस्मिन् विधेयमधुना विधिना विधिज्ञैः शैवं तु निष्कलमलं सकलञ्च युक्त्या ॥२३॥ पेचकसंज्ञक पद-विन्यास में चार पद होते हैं। इसमें पिशाच, भूत, विषग्रह एवं राक्षसों की पूजा होती है। विधियों के ज्ञाता विधिपूर्वक इस प्रकार के कार्यों के लिये इस पदविन्यास को बनाते हैं एवं इसमें सभी विधियों का पालन करते हुये निर्मल एवं निष्कल शिव को प्रतिष्ठित करते हैं॥२३॥ ✺ पीठम् ✺ अथ पीठपदे नवभागयुते दिशि दिश्यथ वेदचतुष्टयकम्। विदुरीशपदाद्युदकं दहनं गगनं पवनं पृथिवी ह्यबहिः ॥२४॥ पीठसंज्ञक पद-विन्यास में नौ पद होते हैं। इसके चारो दिशाओं में चारो वेद, ईशान आदि (कोणों) में क्रमशः उदक (जल), दहन (अग्नि), गगन (आकाश) एवं पवन (वायु) होते हैं तथा मध्य में पृथिवी होती है॥२४॥ ✺ महापीठम् ✺ षोडशांशं महापीठं पञ्चपञ्चामरान्वितम्। ईशो जयन्त आदित्यो भृशोऽग्निर्वितथो यमः ॥२५॥ महापीठ पद-विन्यास में सोलह पद होते हैं एवं इसमें पच्चीस देवता होते हैं। इन पदों में (ईशान कोण से प्रारम्भ कर क्रमशः) देवता इस प्रकार होते हैं—ईश, जयन्त, आदित्य, भृश, अग्नि, वितथ, यम॥२५॥ भृङ्गश्च पितृसुग्रीवौ वरुणः शोषमारुतौ। मुख्यः सोमोऽदितिश्चेति बाह्यदेवाः प्रकीर्तिताः ॥२६॥