मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८ मयमतम् ‘सूर्यविशाल’ में चार सौ पद कहे गये हैं एवं ‘सुसंहित’ पद-विन्यास में चार सौ एकतालीस पद होते हैं।।१५।। सवेदाशीतिचत्वारः शतं सुप्रतिकान्तकम्। नवविंशत्यञ्चशतं विशालं पदमीरितम् ॥१६॥ ‘सुप्रतीकान्त’ में चार सौ चौरासी पद तथा ‘विशाल’ में पाँच सौ उन्तीस पद कहे गये हैं।।१६।। षट्सप्ततिः पञ्चशतं विप्रगर्भमिति स्मृतम्। विश्वेशं षट्शतं पश्चात् पञ्चविंशत्पदं स्मृतम् ॥१७॥ ‘विप्रगर्भ’ पदविन्यास पाँच सौ छिहत्तर तथा ‘विश्वेश’ छः सौ पच्चीस पदों में निर्मित होते हैं।।१७।। षट्सप्ततिः षट्शतकं विपुलभोगमिति स्मृतम्। नवविंशतिकं सप्तशतं विप्रतिकान्तकम् ॥१८॥ ‘विपुलभोग’ में छः सौ छिहत्तर एवं ‘विप्रतिकान्त’ में सात सौ उन्तीस पद होते हैं।।१८।। विशालाक्षपदं वेदाशीतिः सप्तशताधिकम्। सैकाष्टपञ्चयुक्तं चाष्टशतं विप्रभक्तिकम् ॥१९॥ ‘विशालाक्ष’ में सात सौ चौरासी पद तथा ‘विप्रभक्तिक’ में आठ सौ इकतालीस पद होते हैं।।१९।। विश्वेशसारमित्युक्तमेवं नवशतं पदम्। सैकषष्ट्यां नवशतं पदमीश्वरकान्तकम् ॥२०॥ ‘विश्वेशसार’ में नौ सौ पद एवं ‘ईश्वरकान्त’ में नौ सौ इकसठ पद होते हैं।।२०।। चतुर्विंशतिसंयुक्तं सहस्त्रपदसंकुलम्। इन्द्रकान्तमिति प्रोक्तं तन्त्रविद्भिः पुरातनैः ॥२१॥ ‘इन्द्रकान्त’ पदविन्यास में एक हजार चौबीस पद होते हैं। ये तन्त्रशास्त्र के प्राचीन विद्वानों के मत हैं।।२१।। ✺ सकलम् ✺ आद्यं पदं सकलमेकपदं यतीना- मिष्टं हि विष्टरमहाशनवह्निकार्यम्।