मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तमोऽध्यायः 卐 पदविन्यासः ३७ 'सकल' पदविन्यास एक पद से बनता है। 'पेचक' चार पद, 'पीठ' नौ पद एवं 'महापीठ' सोलह पद से बनते हैं।।८।। पञ्चविंशत्युपपीठं षट्षडेवोग्रपीठकम् । स्थण्डिलं सप्तसप्तांशं मण्डूकं चाष्टकाष्टकम् ।।९।। 'उपपीठ' का पदविन्यास पच्चीस पदों से, 'उग्रपीठ' छत्तीस पदों से, 'स्थण्डिल' उनचास पदों से एवं 'मण्डूक' चौसठ पदों से होता है।।९।। परमशायिपदं चैव नन्दनन्दपदं भवेत् । आसनं शतभागं स्यादेकविंशच्छतं पदम् ।।१०।। 'परमशायिक' इक्यासी पदों से एवं 'आसन' सौ पदों से बनता है। एक सौ इक्कीस पदों से—।।१०।। स्थानीयं स्याच्चतुश्चत्वारिंशच्छतपदाधिकम् । देशीयं नवषष्ट्यंशं शतं चोभयचण्डितम् ।।११।। 'स्थानीय' पदों की रचना होती है। 'देशीय' पदविन्यास एक सौ चौवालीस पदों से तथा 'उभयचण्डित' एक सौ उनहत्तर पदों से होता है।।११।। षण्णवत्यधिकं चैव शतं भद्रं महासनम् । सपञ्चविंशद् द्विशतं पद्मगर्भमिति स्मृतम् ।।१२।। 'भद्र-महासन' में एक सौ छियानबे पद होते हैं तथा 'पद्मगर्भ' में दो सौ पच्चीस पद होते हैं।।१२।। षडाधिक्यं तु पञ्चाशद्द्विशतं त्रियुतं पदम् । द्विशतं सनवाशीति व्रतभोगमिति स्मृतम् ।।१३।। 'त्रियुत' में दो सौ छप्पन पद होते हैं एवं 'व्रतभोग' में दो सौ नवासी पद होते हैं।।१३।। त्रिशतं च चतुर्विंशत् कर्णाष्टकपदं तथा । त्रिशतं चैकषष्ट्यंशं गणितं पादसंज्ञितम् ।।१४।। 'कर्णाष्टक' में तीन सौ चौबीस पद तथा 'गणित' वास्तु-पद में तीन सौ एकसठ पद होते हैं।।१४।। चतुःशतपदं सूर्यविशालं परिकीर्तितम् । सुसंहितपदं चैकचत्वारिंशच्चतुः शतम् ।।१५।।