मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमोऽध्यायः 卐 मानोपकरणम् २७ परः शिवसकाशाद्धि ब्रह्मा चेन्द्रोऽपि लोककृत्।।१।। स महाविश्वकर्मेति त्वीश्वरेणैव कीर्तितः। स एवायं विश्वकर्मा ब्रह्माण्डं सृजते मुहुः।।२।। इस विश्वकर्मा के चार मुख थे। पूर्व दिशा के मुख का नाम विश्वभू, दक्षिणमुख विश्वविद्, उत्तरमुख विश्वस्थ एवं पश्चिममुख विश्वस्रष्टा था— विश्वभूरिति नामैतत्पूर्ववक्त्रं प्रकीर्तितम्। दक्षिणे विश्वविद्वक्त्रं विश्वस्थश्च तथोत्तरे।।४।। पश्चिमे विश्वस्रष्टाख्यं वक्त्रमेवं चतुर्विधम्। एतेभ्यः प्रथमो जातो विश्वकर्माचतुष्टयः।।५।। इनसे चार कारवों ( स्थपतियों, विश्वकर्माचतुष्टय )—विश्वकर्मा, मय, त्वष्टा एवं मनु की उत्पत्ति हुई। ये चारो क्रमशः इन्द्र, सुरेन्द्र, वैश्रवण एवं नल के पुत्र ( २.७-८ ) कहे गये— पूर्वानने विश्वकर्मा जायते दक्षिणे मयः। उत्तरस्य मुखे त्वष्टा पश्चिमे तु मनुः स्मृतः।।६।। विश्वकर्मा के पुत्र को स्थपति, मय के पुत्र को सूत्रग्राही, त्वष्टा के पुत्र को वर्धकी एवं मनु के पुत्र को तक्षक कहा गया है— विश्वकर्माख्यानाम्नोऽस्य पुत्रः स्थपतिरुच्यते। मयस्य तनयः सूत्रग्राहीति परिकीर्तितः।।९।। त्वष्टुर्देव-ऋषेः पुत्रो वर्धकीरिति प्रकथ्यते। मनोः पुत्रस्तक्षकः स्यात्स्थपत्यादिचतुष्टयम्।।१०।। इनमें स्थपति को सभी शास्त्रों का ज्ञाता, सूत्रग्राही को मानसूत्र धारण करने वाला, वर्धकी को मानकर्म का ज्ञाता एवं तक्षक को छीलने-काटने का विशेषज्ञ कहा गया है— स्थपतिः सर्वशास्त्रज्ञः सूत्रग्राहीति सूत्रधृत्।।१२।। वर्धकीर्मानकर्मज्ञः तक्षणात्तक्षकः स्मृतः।।१३।। ५. वास्तुविद्या ( १.१२-२० ) में चारो स्थपति आदि का लक्षण इस प्रकार प्राप्त होता है— स्थपति— स्थपतिः स्थापनार्हः स्यात्सर्वशास्त्रविशारदः। न हीनाङ्गोऽतिरिक्ताङ्गो धार्मिकस्तु दयापरः। अमात्सर्योऽनसूयश्च तान्त्रिकस्त्वभिजातवान्।।१३।।