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मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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२६ मयमतम् सामुद्रं गणितं चैव ज्योतिषं छन्द एव च। सिराज्ञानं तथा शिल्पं यन्त्रकर्मविधिस्तथा।।३।। एतान्यङ्गानि जानीयाद्वास्तुशास्त्रस्य बुद्धिमान्।।४।। इसको शास्त्र के साथ कार्य का भी ज्ञान होना चाहिये— यस्तु केवलशास्त्रज्ञः कर्मस्वपरिनिष्ठितः।।८।। स मुह्यति क्रियाकाले दृष्ट्वा भीरुरिवाहवम्। केवलं कर्म यो वेत्ति शास्त्रार्थं नाधिगच्छति।।९।। सोऽचक्षुरिव नीयेत विवशोऽन्येन वर्त्मसु।।१०।। स्थपति का शीलवान होना अत्यावश्यक चारित्रिक गुण है— ज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः।।१६।। २. राजवल्लभमण्डन (१.४१) में भी उपर्युक्त मत की पुष्टि प्राप्त होती है— सुशीलः चतुरो दक्षः शास्त्रज्ञो लोभवर्जितः। क्षमायुक्तो द्विजश्चैव सूत्रधारः स उच्यते।। ३. मनुष्यालयचन्द्रिका (१.११-१३) में स्थपति, सूत्रग्राही, तक्षक एवं वर्धक संज्ञक शिल्पियों के लक्षण इस प्रकार प्राप्त होते हैं— चतुर्धा कारवः— स्थपतिः सूत्रग्राही तक्षकसंज्ञश्च वर्धकिः क्रमशः। स्वोचितकर्मणि दक्षा ग्राह्यास्ते कारवश्चतुर्धैति।।११।। स्थपतिः— सर्वशास्त्रविहितक्रियापटुः सर्वदावहितमानसः शुचिः। धार्मिको विगतमत्सरादिको यः स च स्थपतिरस्तु सत्यवाक्।।१२।। अन्ये कारवः— जानीयात् स्थापनार्हं स्थपतिमथ गुणैः प्रायशस्तेन तुल्यः सूत्रग्राही सुतो वा स्थपतिमतिगतिप्रेक्षकः शिष्यको वा। स्थूलानां तक्षणात्तक्षक इति कथितः सन्ततं हृष्टचित्तो दार्वद्यन्योऽन्यसम्मेलनपटुरुदितो वर्धकिः सावधानः।।१३।। ४. मानसार (२.१-१७) में स्थपतियों के उद्भव, उनके प्रकार, उनके वैशिष्ट्य आदि सभी पर अत्यन्त विस्तार से चिन्तन किया गया है। प्रथम स्थपति इस सृष्टि के सर्जक 'महाविश्वकर्मा' थे—