भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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षष्ठोऽध्यायः 卐 दिक्परिच्छेदः ३३ पदविन्याससूत्रं हि विन्यासः सूत्रमिष्यते । प्रमाणसूत्र के कार्यक्षेत्र के बाहर के चारो ओर के क्षेत्र का जिससे मापन किया जाता है, उस सूत्र को 'पर्यन्त सूत्र' कहते हैं। जिस सूत्र से निश्चित स्थान का निर्धारण, देवताओं के पद का निर्धारण तथा वास्तुपद का विन्यास किया जाता है, उसे 'विन्यास- सूत्र' कहते हैं।।२०।। गृहाणां दक्षिणे गर्भस्तत्पार्श्वे सूत्रपातनम् ॥२१॥ गृह के दक्षिण भाग में गृह का गर्भ होता है, अतः उसी के पास से सूत्रपात प्रारम्भ करना चाहिये।।२१।। तत्सूत्राच्छङ्कुमानेन नीत्वा शङ्कुं निखानयेत् । उपानं निष्क्रमार्थं वा भित्त्यर्थं वाऽथ तद्भवेत् ॥२२॥ उस सूत्र से शङ्कु का मान लेते हुये शङ्कु को भूमि में गाड़ना चाहिये। इसी से प्रवेशमार्ग ( अथवा गृह से बाहर निकलने का मार्ग ) या भित्ति-निर्माण के लिये मापन करना चाहिये।।२२।। नगरग्रामदुर्गेषु वाय्वादी रज्जुपातनम् । अवाच्याशाद्युदीच्यन्तं प्राक्प्रत्यग्गतसूत्रकम् ॥२३॥ नगर, ग्राम एवं दुर्ग के मापन के लिये सर्वप्रथम सूत्रपात वायव्य कोण (उत्तर- पश्चिम ) में करना चाहिये। इसके पश्चात् दक्षिण से उत्तर तथा पूर्व से पश्चिम सूत्रपात करना चाहिये।।२३।। प्रतीच्याशादिपूर्वान्तं विसृजेद् दक्षिणोत्तरम् । ब्रह्मस्थानात् पूर्वगतं तत् त्रिसूत्रं तदुच्यते ॥२४॥ इसके पश्चात् पश्चिम से पूर्व एवं उत्तर से दक्षिण तक सूत्रप्रपात करना चाहिये। जिस सूत्र से ब्रह्मा के पद से प्रारम्भ कर पूर्व दिशा तक मापन किया जाता है, उसे 'त्रिसूत्र' कहते हैं।।२४।। ततो धनं पश्चिमगं धान्यं दक्षिणगं ततः । ब्रह्मस्थानादुत्तरगं सुखमित्यभिधीयते ॥२५॥ इसके पश्चात् ब्रह्मस्थान से पश्चिम की ओर जाने वाले सूत्र को 'धन', दक्षिण की ओर जाने वाले सूत्र को 'धान्य' एवं उत्तर की ओर जाने वाले सूत्र को 'सुख' कहते हैं।।२५।। सुखप्रमाणं यत् सूत्रं तत्प्रमाणमिहोच्यते । मय०-३