भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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३४ मयमतम् एकहस्तं द्विहस्तं वा त्रिहस्तं परितोऽधिकम् । विमानं मण्डपव्यासात् खानयेत् तद्बलार्थकम् ॥२६॥ जिस सूत्र से सुखप्रमाण प्राप्त होता है, उसका माप यहाँ वर्णित है। बल के लिये केन्द्र के चारो ओर मण्डप के व्यास से एक हाथ, दो हाथ या तीन हाथ की दूरी लेते हुये उत्खनन करना चाहिये।।२६।। ❋ पुनरपच्छाया ❋ द्व्येकं नो नैकनेत्रे नयनगुणयुगं चाब्धिरुद्राक्षमक्षी नैत्रैकं नो न चन्द्रं नयननयनकं वह्निवेदाब्धिबाणम् । षट्षट्सप्ताष्टकाष्टैर्मुनिरसरसकं भूतवेदाब्ध्यजाक्षं नेत्रं मात्रञ्च मेषादिषु दशदशकेऽस्मिन्दिने त्यज्य युक्त्यात् ॥२७॥ पुनः दोषयुक्त छाया—पूर्व एवं पश्चिम के निर्धारण के लिये प्रत्येक माह प्रत्येक दस दिन के काल-खण्ड में संख्याओं का संयोजन इस प्रकार करना चाहिये—सूर्य का सङ्क्रमण मेष राशि में होने पर दो, एक, शून्य; वृष में होने पर शून्य, एक, दो; मिथुन में होने पर दो, तीन, चार; कर्क में होने पर चार, तीन, दो; सिंह में होने पर दो, एक, शून्य; कन्या में होने पर शून्य, एक, दो; तुला में होने पर दो, तीन, चार; वृश्चिक में होने पर चार, पाँच, छः; धनु में होने पर छः, सात, आठ; मकर में होने पर आठ, सात, छः; कुम्भ में होने पर छः, पाँच, चार तथा मीन में होने पर चार, तीन एवं दो।।२७।। समीक्ष्य भागौर्गमनं सराशिकं त्यजेत् पुरोक्ताङ्गुलिमन्त्रयुक्तितः । ततस्तु काष्ठादुपगृह्य तद्दशाद् विसृज्य सूत्रं विदधीत च स्थलम् ॥२८॥ इति मयमते वास्तुशास्त्रे दिक्परिच्छेदो नाम षष्ठोऽध्यायः राशि के साथ सूर्य की गति का विचार एवं युक्तिपूर्वक समीक्षा करते हुये पूर्वोक्त अङ्गुलियों को छोड़ देना चाहिये। इसके अनुसार सीमा एवं दिशा आदि का शङ्कु द्वारा ग्रहण करते हुये स्थान को तैयार करना चाहिये।।२८।।