भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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षष्ठोऽध्यायः 卐 दिक्परिच्छेदः ३५ व्याख्यात्मक टिप्पणी दिशानिर्धारण ( श्लोक-१-२ ) दिशा-निर्धारण के सन्दर्भ में ज्योतिष-परक विचार अनेक वास्तु-ग्रन्थों में अत्यन्त विस्तार से प्राप्त होते हैं। इनमें मानसार ( अ. ५६ ) अजिताङ्गम (९), ईशानशिवगुरु- देवपद्धति ( क्रिया-२४.१.२४ ), विश्वकर्मवास्तुशास्त्र (३), अपराजितपृच्छा (६३), राजवल्लभमण्डन (१), मनुष्यालयचन्द्रिका (२), काश्यपशिल्प (१) आदि उल्लेखनीय ग्रन्थ हैं। शङ्कुलक्षण ( श्लोक-३-१० ) उपर्युक्त ग्रन्थों में दिशा-निर्धारण के सन्दर्भ में शङ्कु के काष्ठ, मान एवं आकृति का भी उल्लेख प्राप्त होता है। मयमत (६.७) में शङ्कु का शीर्षभाग चित्रवृत्तक ( गोला-कार ) कहा गया है। मानसार (६.८) में इसे छत्राकार कहा गया है— सुवृत्तं निर्व्रणं चैव छत्राकारं तदग्रकम्। अपच्छाया ( श्लोक ११-१३ ) सूर्य की राशियों पर सङ्क्रान्ति के अनुसार शङ्कु की छाया अलग-अलग स्थान पर पड़ती है। इससे सटीक पूर्व-पश्चिम दिशा का ज्ञान करना कठिन होता है। इन श्लोकों में सूर्य की राशियों पर सङ्क्रान्ति के अनुसार छाया पूर्व से कितना हट कर पड़ती है एवं कितने अङ्गुल छाया से हट कर सही दिशा प्राप्त होती है, इसका वर्णन किया गया है। इस प्रसङ्ग पर विचार विश्वकर्मवास्तुशास्त्र ( अ. ३ ), अपराजितपृच्छा ( अ. ६३ ), मनुष्यालयचन्द्रिका ( अ. २ ), मानसार ( अ. ६ ), काश्यपशिल्प ( अ. १ ) आदि ग्रन्थों में विस्तार से किया गया है।