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मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

षष्ठोऽध्यायः 卐 दिक्परिच्छेदः ३५ व्याख्यात्मक टिप्पणी दिशानिर्धारण ( श्लोक-१-२ ) दिशा-निर्धारण के सन्दर्भ में ज्योतिष-परक विचार अनेक वास्तु-ग्रन्थों में अत्यन्त विस्तार से प्राप्त होते हैं। इनमें मानसार ( अ. ५६ ) अजिताङ्गम (९), ईशानशिवगुरु- देवपद्धति ( क्रिया-२४.१.२४ ), विश्वकर्मवास्तुशास्त्र (३), अपराजितपृच्छा (६३), राजवल्लभमण्डन (१), मनुष्यालयचन्द्रिका (२), काश्यपशिल्प (१) आदि उल्लेखनीय ग्रन्थ हैं। शङ्कुलक्षण ( श्लोक-३-१० ) उपर्युक्त ग्रन्थों में दिशा-निर्धारण के सन्दर्भ में शङ्कु के काष्ठ, मान एवं आकृति का भी उल्लेख प्राप्त होता है। मयमत (६.७) में शङ्कु का शीर्षभाग चित्रवृत्तक ( गोला-कार ) कहा गया है। मानसार (६.८) में इसे छत्राकार कहा गया है— सुवृत्तं निर्व्रणं चैव छत्राकारं तदग्रकम्। अपच्छाया ( श्लोक ११-१३ ) सूर्य की राशियों पर सङ्क्रान्ति के अनुसार शङ्कु की छाया अलग-अलग स्थान पर पड़ती है। इससे सटीक पूर्व-पश्चिम दिशा का ज्ञान करना कठिन होता है। इन श्लोकों में सूर्य की राशियों पर सङ्क्रान्ति के अनुसार छाया पूर्व से कितना हट कर पड़ती है एवं कितने अङ्गुल छाया से हट कर सही दिशा प्राप्त होती है, इसका वर्णन किया गया है। इस प्रसङ्ग पर विचार विश्वकर्मवास्तुशास्त्र ( अ. ३ ), अपराजितपृच्छा ( अ. ६३ ), मनुष्यालयचन्द्रिका ( अ. २ ), मानसार ( अ. ६ ), काश्यपशिल्प ( अ. १ ) आदि ग्रन्थों में विस्तार से किया गया है।

अथ सप्तमोऽध्यायः ( पदविन्यासः ) वक्ष्येऽहं पदविन्यासं सर्ववस्तुसनातनम् । वास्तुपद-विन्यास—मैं ( मय ऋषि ) सभी वास्तुमण्डलों के पद-विन्यास का वर्णन करता हूँ। ✺ द्वात्रिंशत् पदानि ✺ सकलं पेचकं पीठं महापीठमतः परम् ॥१॥ उपपीठमुग्रपीठं स्थण्डिलं नाम चण्डितम् । मण्डूकपदकं चैव पदं परमशायिकम् ॥२॥ तथासनं च स्थानीयं देशीयोभयचण्डितम् । भद्रं महासनं पद्मगर्भं च त्रियुतं पदम् ॥३॥ व्रतभोगपदं चैव कर्णाष्टकपदं तथा । गणितं पादमित्युक्तं पदं सूर्यविशालकम् ॥४॥ सुसंहितपदं चैव सुप्रतीकान्तमेव च । विशालं विप्रगर्भं च विश्वेशं च ततः परम् ॥५॥ तथा विपुलभोगं च पदं विप्रतिकान्तकम् । विशालाक्षपदं चैव विप्रभक्तिकसंज्ञकम् ॥६॥ पदं विश्वेशसारं च तथैवेश्चरकान्तकम् । इन्द्रकान्तपदं चैव द्वात्रिंशत् कथितानि वै ॥७॥ बत्तीस प्रकार के पदविन्यास होते हैं। उनके नाम हैं—सकल, पेचक, पीठ, महापीठ, उपपीठ, उग्रपीठ, स्थण्डिलचण्डित, मण्डूक, परमशायिक, आसन, स्थानीय, देशीय, उभयचण्डित, भद्रमहासन, पद्मगर्भ, त्रियुत, व्रतभोग, कर्णाष्टक, गणित, सूर्यविशालक, सुसंहित, सुप्रतीकान्त, विशाल, विप्रगर्भ, विश्वेश, विपुलभोग, विप्रति- कान्त, विशालाक्ष, विप्रभक्तिक, विश्वेशसार, ईश्वरकान्त एवं इन्द्रकान्त॥१-७॥ सकलं पदमेकं स्यात् पेचकं तु चतुष्पदम् । पीठं नवपदं चैव महापीठं द्विरष्टकम् ॥८॥

सप्तमोऽध्यायः 卐 पदविन्यासः ३७ 'सकल' पदविन्यास एक पद से बनता है। 'पेचक' चार पद, 'पीठ' नौ पद एवं 'महापीठ' सोलह पद से बनते हैं।।८।। पञ्चविंशत्युपपीठं षट्षडेवोग्रपीठकम् । स्थण्डिलं सप्तसप्तांशं मण्डूकं चाष्टकाष्टकम् ।।९।। 'उपपीठ' का पदविन्यास पच्चीस पदों से, 'उग्रपीठ' छत्तीस पदों से, 'स्थण्डिल' उनचास पदों से एवं 'मण्डूक' चौसठ पदों से होता है।।९।। परमशायिपदं चैव नन्दनन्दपदं भवेत् । आसनं शतभागं स्यादेकविंशच्छतं पदम् ।।१०।। 'परमशायिक' इक्यासी पदों से एवं 'आसन' सौ पदों से बनता है। एक सौ इक्कीस पदों से—।।१०।। स्थानीयं स्याच्चतुश्चत्वारिंशच्छतपदाधिकम् । देशीयं नवषष्ट्यंशं शतं चोभयचण्डितम् ।।११।। 'स्थानीय' पदों की रचना होती है। 'देशीय' पदविन्यास एक सौ चौवालीस पदों से तथा 'उभयचण्डित' एक सौ उनहत्तर पदों से होता है।।११।। षण्णवत्यधिकं चैव शतं भद्रं महासनम् । सपञ्चविंशद् द्विशतं पद्मगर्भमिति स्मृतम् ।।१२।। 'भद्र-महासन' में एक सौ छियानबे पद होते हैं तथा 'पद्मगर्भ' में दो सौ पच्चीस पद होते हैं।।१२।। षडाधिक्यं तु पञ्चाशद्द्विशतं त्रियुतं पदम् । द्विशतं सनवाशीति व्रतभोगमिति स्मृतम् ।।१३।। 'त्रियुत' में दो सौ छप्पन पद होते हैं एवं 'व्रतभोग' में दो सौ नवासी पद होते हैं।।१३।। त्रिशतं च चतुर्विंशत् कर्णाष्टकपदं तथा । त्रिशतं चैकषष्ट्यंशं गणितं पादसंज्ञितम् ।।१४।। 'कर्णाष्टक' में तीन सौ चौबीस पद तथा 'गणित' वास्तु-पद में तीन सौ एकसठ पद होते हैं।।१४।। चतुःशतपदं सूर्यविशालं परिकीर्तितम् । सुसंहितपदं चैकचत्वारिंशच्चतुः शतम् ।।१५।।

३८ मयमतम् ‘सूर्यविशाल’ में चार सौ पद कहे गये हैं एवं ‘सुसंहित’ पद-विन्यास में चार सौ एकतालीस पद होते हैं।।१५।। सवेदाशीतिचत्वारः शतं सुप्रतिकान्तकम्। नवविंशत्यञ्चशतं विशालं पदमीरितम् ॥१६॥ ‘सुप्रतीकान्त’ में चार सौ चौरासी पद तथा ‘विशाल’ में पाँच सौ उन्तीस पद कहे गये हैं।।१६।। षट्सप्ततिः पञ्चशतं विप्रगर्भमिति स्मृतम्। विश्वेशं षट्शतं पश्चात् पञ्चविंशत्पदं स्मृतम् ॥१७॥ ‘विप्रगर्भ’ पदविन्यास पाँच सौ छिहत्तर तथा ‘विश्वेश’ छः सौ पच्चीस पदों में निर्मित होते हैं।।१७।। षट्सप्ततिः षट्शतकं विपुलभोगमिति स्मृतम्। नवविंशतिकं सप्तशतं विप्रतिकान्तकम् ॥१८॥ ‘विपुलभोग’ में छः सौ छिहत्तर एवं ‘विप्रतिकान्त’ में सात सौ उन्तीस पद होते हैं।।१८।। विशालाक्षपदं वेदाशीतिः सप्तशताधिकम्। सैकाष्टपञ्चयुक्तं चाष्टशतं विप्रभक्तिकम् ॥१९॥ ‘विशालाक्ष’ में सात सौ चौरासी पद तथा ‘विप्रभक्तिक’ में आठ सौ इकतालीस पद होते हैं।।१९।। विश्वेशसारमित्युक्तमेवं नवशतं पदम्। सैकषष्ट्यां नवशतं पदमीश्वरकान्तकम् ॥२०॥ ‘विश्वेशसार’ में नौ सौ पद एवं ‘ईश्वरकान्त’ में नौ सौ इकसठ पद होते हैं।।२०।। चतुर्विंशतिसंयुक्तं सहस्त्रपदसंकुलम्। इन्द्रकान्तमिति प्रोक्तं तन्त्रविद्भिः पुरातनैः ॥२१॥ ‘इन्द्रकान्त’ पदविन्यास में एक हजार चौबीस पद होते हैं। ये तन्त्रशास्त्र के प्राचीन विद्वानों के मत हैं।।२१।। ✺ सकलम् ✺ आद्यं पदं सकलमेकपदं यतीना- मिष्टं हि विष्टरमहाशनवह्निकार्यम्।

सप्तमोऽध्यायः 卐 पदविन्यासः ३९ पित्र्यामरादियजनं गुरुपूजनं च भान्वार्कितोयशशिनामकसूत्रयुक्ते ॥२२॥ प्रथम वास्तुपद-विन्यास में केवल एक पद होता है। यह यतियों के लिये अनुकूल होता है। इसमें अग्निकार्य होता है एवं इसमें कुश बिछाया जाता है। इस पर पितृपूजन, देवपूजन एवं गुरुपूजन का कार्य सम्पन्न होता है। इसके चारो ओर खींची गई रेखायें भानु, अर्कि, तोय एवं शशि कहलाती हैं॥२२॥ ✺ पेचकम् ✺ पैशाचभूतसविषग्रहरक्षकास्ते पूज्या हि पेचकपदे चतुरंशयुक्ते। तस्मिन् विधेयमधुना विधिना विधिज्ञैः शैवं तु निष्कलमलं सकलञ्च युक्त्या ॥२३॥ पेचकसंज्ञक पद-विन्यास में चार पद होते हैं। इसमें पिशाच, भूत, विषग्रह एवं राक्षसों की पूजा होती है। विधियों के ज्ञाता विधिपूर्वक इस प्रकार के कार्यों के लिये इस पदविन्यास को बनाते हैं एवं इसमें सभी विधियों का पालन करते हुये निर्मल एवं निष्कल शिव को प्रतिष्ठित करते हैं॥२३॥ ✺ पीठम् ✺ अथ पीठपदे नवभागयुते दिशि दिश्यथ वेदचतुष्टयकम्। विदुरीशपदाद्युदकं दहनं गगनं पवनं पृथिवी ह्यबहिः ॥२४॥ पीठसंज्ञक पद-विन्यास में नौ पद होते हैं। इसके चारो दिशाओं में चारो वेद, ईशान आदि (कोणों) में क्रमशः उदक (जल), दहन (अग्नि), गगन (आकाश) एवं पवन (वायु) होते हैं तथा मध्य में पृथिवी होती है॥२४॥ ✺ महापीठम् ✺ षोडशांशं महापीठं पञ्चपञ्चामरान्वितम्। ईशो जयन्त आदित्यो भृशोऽग्निर्वितथो यमः ॥२५॥ महापीठ पद-विन्यास में सोलह पद होते हैं एवं इसमें पच्चीस देवता होते हैं। इन पदों में (ईशान कोण से प्रारम्भ कर क्रमशः) देवता इस प्रकार होते हैं—ईश, जयन्त, आदित्य, भृश, अग्नि, वितथ, यम॥२५॥ भृङ्गश्च पितृसुग्रीवौ वरुणः शोषमारुतौ। मुख्यः सोमोऽदितिश्चेति बाह्यदेवाः प्रकीर्तिताः ॥२६॥

४० मयमतम् भृङ्ग, पितृ, सुग्रीव, वरुण, शोष, मारुत, मुख्य, सोम एवं अदिति बाह्य पदों के देवता कहे गये हैं।।२६।। आपवत्सार्यसावित्रा विवस्वानिन्द्रमित्रकौ । रुद्रजो भूधरश्चान्तर्मध्ये ब्रह्मा स्थितः प्रभुः ॥२७॥ अन्दर के पदों के देवता आपवत्स, आर्य, सावित्र, विवस्वान्, इन्द्र, मित्र, रुद्रज एवं भूधर हैं। केन्द्र में ब्रह्मा स्थित होते हैं, जो सबके स्वामी कहे गये हैं।।२७।। ✺ उपपीठादि ✺ तत्पार्श्वयोर्द्वयोरेकभागेनैकेन वर्धनात् । उपपीठं भवेदत्र देवतास्ताः पदे स्थिताः ॥२८॥ उपपीठ वास्तु-विन्यास में वे ( पूर्वोक्त ) देवता अपने पदों के अतिरिक्त अपने दोनों पाश्र्वों में एक-एक पद की वृद्धि प्राप्त करते हुये स्थित होते हैं।।२८।। तत्तत्पार्श्वद्वयोश्चैवमेकैकांशविवर्धनात् । इन्द्रकान्तपदं यावत्तावद्युञ्जीत बुद्धिमान् ॥२९॥ बुद्धिमान् ( स्थपति ) को चाहिये कि उन देवों के दोनों पाश्र्वों में एक-एक पद की वृद्धि तब तक करे, जब तक इन्द्रकान्त पद न बन जाय।।२९।। समानि यानि भागानि चतुःषष्ठिदाचरेत् । असमान्यपि सर्वाणि चैकाशीतिपदोक्तवत् ॥३०॥ जिन वास्तु-विन्यासों में सम संख्या में पद हों, उन्हें चौंसठ पद वाले वास्तु के समान एवं विषम संख्या में पद हों तो इक्यासी पद वाले वास्तु के समान ( देवों को ) रखना चाहिये।।३०।। पदानामपि सर्वेषां मण्डूकं चापि तत्परम् । चण्डितं सर्ववस्तूनामाह्रत्यं च यतस्ततः ॥३१॥ सभी वास्तु-विन्यासों में मण्डूकसंज्ञक वास्तुपद-विन्यास सभी निर्माण-कार्यों के लिये उपयुक्त होता है; क्योंकि यह ( तान्त्रिक ) विधि पर आधारित होता है।।३१।। तस्मात् संक्षिप्य तन्त्रेभ्यो वक्ष्येऽहमपि तद् द्वयम् । चतुःषष्टिपदे चैकाशीतौ सकलनिष्कले ॥३२॥ इसलिये मैं ( मय ऋषि ) तन्त्रों से संक्षेप में विषय ग्रहण कर सकल एवं निष्कल चौंसठ एवं इक्यासी दो पदविन्यासों का वर्णन करता हूँ।।३२।। सूत्रे च पदमध्ये च ब्रह्माद्याः स्थापिताः सुराः । प्रागुदग्दिक्समारभ्यैवोच्यन्ते देवताः पृथक् ॥३३॥

सप्तमोऽध्यायः 卐 पदविन्यासः ४१ ( उपर्युक्त दोनों पदविन्यासों में ) वास्तुपद के मध्य में ब्रह्मा आदि देवता स्थापित किये जाते हैं। ईशान कोण से प्रारम्भ कर पृथक्-पृथक् स्थापित किये जाने वाले देवता का यहाँ वर्णन किया जा रहा है।।३३।। ✺ दैवतस्थानानि ✺ ईशानश्चैव पर्जन्यो जयन्तश्च महेन्द्रकः। आदित्यः सत्यकश्चैव भृशश्चैवान्तरिक्षकः ॥३४॥ वास्तुदेवों के स्थान—( ईशान कोण से प्रारम्भ करते हुये देवता इस प्रकार हैं— ) ईशान, पर्जन्य, जयन्त, महेन्द्रक, आदित्य, सत्यक, भृश तथा अन्तरिक्ष।।३४।। अग्निः पूषा च वितथो राक्षसश्च यमस्तथा। गन्धर्वो भृङ्गराजश्च मृषश्च पितृदेवताः ॥३५॥ ( आग्नेय कोण से नैर्ऋत्य कोण के देवता इस प्रकार हैं— ) अग्नि, पूषा, वितथ, राक्षस, यम, गन्धर्व, भृङ्गराज, मृष तथा पितृदेवता।।३५।। दौवारिकश्च सुग्रीवः पुष्पदन्तो जलाधिपः। असुरः शोषरोगौ च वायुर्नगस्तथैव च ॥३६॥ ( पश्चिम से वायव्य तक तथा उत्तर के देवता इस प्रकार हैं— ) दौवारिक, सुग्रीव, पुष्पदन्त, जलाधिप ( वरुण ), असुर, शोष, रोग, वायु एवं ( उत्तर दिशा में ) नाग।।३६।। मुख्यो भल्लाटकश्चैव सोमश्चैव मृगस्तथा। अदितिश्शोदितिश्चैव द्वात्रिंशद् बाह्यदेवताः ॥३७॥ ( उत्तर दिशा के देवता हैं— ) मुख्य, भल्लाटक, सोम, मृग, अदिति एवं उदिति—ये बत्तीस बाह्य पदों के देवता हैं।।३७।। आपश्चैवापवत्सश्चैवान्तः प्रागुत्तरे स्मृतौ । सविन्द्रश्चैव साविन्द्रश्चान्तः प्राग्दक्षिणे स्मृतौ ॥३८॥ अन्तःदेवों में पूर्वोत्तर ( ईशान ) में आप एवं आपवत्स देवता तथा पूर्व-दक्षिण ( आग्नेय कोण ) में सविन्द्र एवं साविन्द्र देवता होते हैं।।३८।। इन्द्रश्चैवेन्द्रराजश्च दक्षिणापरतः स्थितौ । रुद्रो रुद्रजयश्चैव पश्चिमोत्तरतो दिशि ॥३९॥ दक्षिण-पश्चिम ( नैर्ऋत्य कोण ) में इन्द्र एवं इन्द्रराज तथा पश्चिमोत्तर ( वायव्य कोण ) में रुद्र एवं रुद्रजय देवता कहे गये हैं।।३९।।

४२ मयमतम् ब्रह्मा मध्ये स्थितः शम्भुस्तन्मुखस्थाश्चतुःसुराः । आर्यो विवस्वान् मित्रश्च भूधरश्चैव कीर्तिताः ॥४०॥ मध्य में स्थित ब्रह्मा शम्भु हैं तथा आर्य, विवस्वान्, मित्र एवं भूधर—ये चार देवता उनकी ओर मुख करके स्थित होते हैं॥४०॥ चरकी च विदारी च पूतना पापराक्षसी । ईशानादि बहिः स्थाप्याश्चतुष्कोणे स्त्रियः स्मृताः । नपदा बलिभोक्तारः शेषाणां पदमुच्यते ॥४१॥ ईशान आदि चारो कोणों के बाहर क्रमशः चार स्त्री-देवताओं—चरकी, विदारी, पूतना एवं पापराक्षसी की स्थापना होनी चाहिये। ये चारो विना पद के ही बलि (वास्तु के निमित्त हविष् ) ग्रहण करती हैं। शेष देवों का पद कहा गया है॥४१॥ विंशत्सूत्रैः सन्धिभिः सप्तवेदैः षट्षट्संख्याभिश्चतुष्कैश्र षट्कैः । अर्कैः शूलैर्वेदसंख्याः सिराभिः संयुक्तं स्यादष्टकेनैकमेतत् ॥४२॥ इस प्रकार इकयासी संख्याओं का एक पद वास्तुचक्र में मण्डलदेवताओं का होता है, जिसका विवरण अग्रलिखित है—२० + ७ + ६ + ६ + ६ + ६ + ६ + १२ + ४ + ८ = ८१ अर्थात् खड़ी और पड़ी दश-दश रेखायें होने से इकयासी पद का वास्तुचक्र सम्पन्न होता है॥४२॥ ❋ मण्डूकपदम् ❋ चतुःषष्टिपदे मध्ये ब्रह्मणश्च चतुष्पदम् ॥४३॥ चौंसठ पद वाले मण्डूक पद में मध्य के चार पद में ब्रह्मा होते हैं॥४३॥ आर्यकादिचतुर्देवाः प्रागादित्रित्रिभागिनः । आपाद्यष्टामराः कोणेष्वर्धार्धपदभागिनः ॥४४॥ (ब्रह्मा के पश्चात् उनके चारो ओर ) आर्यक आदि चार देवता ( आर्य, विवस्वान्, मित्र, भूधर ) पूर्व से आरम्भ होकर तीन-तीन पद में स्थित होते हैं। आप आदि आठ देवता ( आप, आपवत्स, सविन्द्र, साविन्द्र, इन्द्र, इन्द्रराज, रुद्र एवं रुद्रजय ) ब्रह्मा के चारो कोणों में आधे-आधे पद में प्रतिष्ठित होते हैं॥४४॥ महेन्द्रराक्षसाद्याश्च पुष्पभल्लाटकादयः । दिशि दिश्यथ चत्वारो देवा द्विपदभोगिनः ॥४५॥

सप्तमोऽध्यायः 卐 पदविन्यासः ४३ महेन्द्र, राक्षस, पुष्प एवं भल्लाटक—ये चारो देवता दिशाओं में ( क्रमशः पूर्व, दक्षिण, पश्चिम एवं पूर्व में ) दो-दो पद के भागी बनते हैं।।४५।। जयन्तश्चान्तरिक्षश्च वितथश्च मृषस्तथा। सुग्रीवो रोगमुख्यश्च दितिश्चैकैकभागिनः ।।४६।। जयन्त, अन्तरिक्ष, वितथ, मृष, सुग्रीव, रोग, मुख्य एवं दिति को एक-एक पद प्राप्त होता है।।४६।। ईशाद्यष्टामराः शेषाः कोणेष्वर्धपदेश्वराः। एवं क्रमेण भुञ्जीरन् मण्डूके वास्तुदेवताः ।।४७।। शेष बचे ईश आदि आठ देवता ( ईश, पर्जन्य, अग्नि, पूषा, पितृदेवता, दौवारिक, वायु एवं नाग ) कोणों पर आधा-आधा पद प्राप्त करते हैं। इस प्रकार मण्डूक वास्तुपद में देवताओं को स्थान प्राप्त होता है।।४७।। स्वस्वप्रदक्षिणवशात् पदभुक्तिक्रमं विदुः। ब्रह्माणं च निरीक्ष्यैते स्थिताः स्वस्वपदेऽमराः ।।४८।। अपने-अपने क्रम से ये सभी देवता बाँयें से दाहिने पदों में स्थित होते हैं। सभी देवगण ब्रह्मा को देखते हुये अपने-अपने पदों में स्थान ग्रहण करते हैं।।४८।। ❋ वास्तुपुरुषविधानम् ❋ षड्वंशमेकहृदयं चतुर्मर्म चतुःसिरम्। मेदिन्यां वास्तुपुरुषं निकुब्जं प्राक्शिरं विदुः ।।४९।। वास्तुपुरुष की रचना—वास्तु-पुरुष निकुब्ज पूर्व दिशा में सिर किये वास्तु- भूमि पर स्थित होता है। उसके छः वंश ( अस्थियाँ ), चार मर्मस्थल, चार सिरायें एवं एक हृदय होते हैं।।४९।। तस्योत्तमाङ्गं विज्ञेयमार्यको नाम देवता। सविन्द्रो दक्षिणभुजः साविन्द्रः कक्षमुच्यते ।।५०।। उस वास्तुपुरुष के सिर आर्यकसंज्ञक देवता होते हैं। सविन्द्र दाहिनी भुजा एवं साविन्द्र कक्ष होते हैं।।५०।। आपश्चैवापवत्सश्च सकक्षो वामतो भुजः। विवस्वान् दक्षिणं पार्श्वं वामपार्श्वं महीधरः ।।५१।। आप एवं आपवत्स कक्षसहित वाम भुजा, विवस्वान् दक्षिण पार्श्व एवं महीधर वाम पार्श्व बनते हैं।।५१।।

४४ मयमतम् मध्ये ब्रह्ममयः कायो मित्रः पुंस्त्वं विधीयते। इन्द्रश्चैवेन्द्रराजश्च दक्षिणः पाद ईरितः॥५२॥ वास्तुपुरुष का मध्य शरीर ब्रह्मा से निर्मित होता है एवं मित्र उसके पुरुषलिङ्ग होते हैं। इन्द्र एवं इन्द्रराज वास्तुपुरुष के दक्षिण पाद कहे गये हैं॥५२॥ रुद्रो रुद्रजयो वामपादः शेते त्वधोमुखः। वस्तुत्रिभागमध्ये तु वंशाः षट् प्रागुदङ्मुखाः ॥५३॥ रुद्र एवं रुद्रजय इसके वाम पाद हैं एवं वह अधोमुख होकर भूमि पर सोता है। इसके छः वंश (रेखायें) हैं, जो पूर्व एवं उत्तर की ओर होते हैं॥५३॥ वस्तुमध्ये तु मर्माणि ब्रह्मा हृदयमुच्यते। निष्कूटांशाः सिरा ज्ञेया इत्येष पुरुषः स्मृतः ॥५४॥ वास्तुमण्डल के मध्य में वास्तुपुरुष के मर्मस्थल होते हैं एवं ब्रह्मा वास्तुपुरुष के हृदय हैं। वास्तुमण्डल के निष्कूट अंश (रेखायें) वास्तुपुरुष की सिरायें (रक्तवाहिनी शिरायें) होती हैं॥५४॥ गृहे गृहे मनुष्याणां शुभाशुभकरः स्मृतः। तस्याङ्गानि गृहाङ्गैश्च विद्वान् नैवोपपीडयेत् ॥५५॥ मनुष्यों के प्रत्येक गृह में वास्तुपुरुष का निवास होता है, जो गृह में रहने वालों के शुभ एवं अशुभ परिणाम का कारक होता है। विद्वान् मनुष्य को चाहिये कि वास्तु- पुरुष के अङ्गों को गृह के अङ्गों (स्तम्भ, भित्ति आदि) से पीड़ित न करे॥५५॥ व्याधयस्तु यथासंख्यं भर्तुरङ्गे तु संश्रिताः। तस्मात् परिहरेद् विद्वान् पुरुषाङ्गं तु सर्वथा। वास्तुपुरुष का जो-जो अङ्ग पीड़ित होता है, गृहस्वामी के उस-उस अङ्ग में रोग होते हैं। अतः विद्वान् गृहस्वामी को वास्तुपुरुष के अंगों पर निर्माणकार्य का सर्वथा त्याग करना चाहिये। ✺ पुनर्मण्डूकपदम् ✺ चत्वारिंशच्च पञ्चैते देवतानां समुच्चयः ॥५६॥ अष्टाष्टांशे कस्या धस्तन्मुखाना- मिष्टं गांशं व्यञ्जनं षोडशानाम्। अष्टानां कः षोडशानां खभागं मण्डूकाख्ये स्थण्डिले तैतिलेषु ॥५७॥

सप्तमोऽध्यायः 卐 पदविन्यासः ४५ **पुनः मण्डूक-पदविन्यास—**वास्तु-मण्डल में ४५ देवता होते हैं। मण्डूकसंज्ञक वास्तुमण्डल में चौंसठ पद होते हैं। केन्द्र में ब्रह्मा के चार पद होते हैं। ब्रह्मा की ओर मुख किये चार देवों के तीन-तीन पद, सोलह देवों के आधे-आधे पद, आठ देवों के एक-एक पद एवं सोलह के दो पद होते हैं।।५६-५७।। ✺ परमशायिपदम् ✺ परमशायिपदे नवभागभाक् कमलजो मुखतस्तु चतुःसुराः । रसपदा द्विपदा हि विदिक्स्थिता बहिरथैकपदाः सकलामराः ॥५८॥ इति मयमते वास्तुशास्त्रे पददेवताविन्यासो नाम सप्तमोऽध्यायः परमशायी वास्तु-मण्डल में ब्रह्मा को नौ पद प्राप्त होते हैं। उनकी ओर मुख किये चारो देवों को छः-छः पद, कोण में स्थित देवों को दो-दो पद एवं बाहर स्थित सभी देवों को एक-एक पद प्राप्त होता है।।५८।। व्याख्यात्मक टिप्पणी बत्तीस पद-वास्तु ( श्लोक १-७ ) प्रायः वास्तु-ग्रन्थों में प्रचलित वास्तु-पद चौंसठ (८×८), इक्यासी (९×९) एवं शतपद वास्तु (१०×१०) हैं। मय ने बत्तीस वास्तुपदों का उल्लेख किया है। बत्तीस वास्तुपदों का उल्लेख मानसार एवं शिल्परत्न में प्राप्त होता है। मानसार (७.१-२५) में बत्तीस वास्तुपद इस प्रकार हैं—सकल, पैशाच ( पेचक ), पीठ, महापीठ, उपपीठ, उग्रपीठ, स्थण्डिल, चण्डित, परमशाधिक ( परमशायिक ), आसन, स्थानीय, देश्य, उभयचण्डित, भद्र, महासन, पद्मगर्भ, त्रियुत, कर्णाष्टक, गणित, सूर्यविशालक, सुसंहित, सुप्रतिकान्त, विशालक, विप्रगर्भ, विश्वेश, विपुलभोग, विप्रकान्त, विशालाक्ष, विप्रभक्ति, विश्वेशसार, ईश्वरकान्त एवं चन्द्रकान्त। ये नाम मयमत से किञ्चित् पृथक् हैं। शिल्परत्न ( पूर्व भाग-६.१-७ ) में वर्णित वास्तुपदों के अभिधान मयमत की सूची से अधिक निकट हैं—

४६ मयमतम् सकलं पेचकं पीठं महापीठोपपीठके ।। उग्रपीठं स्थण्डिलञ्च मण्डूकपरशायिकम्। आसनञ्च तथा स्थानीयञ्च देशीयमुच्यते ।। मयचण्डिताख्यपदं तथा भद्रमहासनम्। पद्मगर्भं त्रियुतकं वृत्ताभोगाभिधं पुनः ।। कर्णाष्टकपदं तद्वत्तथैव गणिकापदम्। पदं सूर्यविशालं तु सुसंहितपदं पुनः ।। सुप्रतीकान्तं तद्वद्विशालं विप्रगर्भकम्। विश्वेशं विपुलभोगं तथा विप्रतिकान्तकम् ।। विशालाक्षं विप्रभक्तिकञ्च विश्वेशसारकम्। तथैवेश्वरकान्ताख्यमिन्द्रकान्तपदं पुनः ।। द्वात्रिंशद्भेदसंयुक्तमेवं पदमिति स्मृतम्। किन्तु समराङ्गणसूत्रधार (१३) एवं अपराजितपृच्छा (५७) में वास्तुपदों के भेद मयमत से भिन्न हैं। समराङ्गणसूत्रधार में तीन प्रधान वास्तुभेद माने गये हैं—इक्यासी पद, एक सौ पद एवं चौंसठ पद— एकाशीतिपदो यः स्यात्तथा शतपदश्च यः। चतुःषष्टिपदो यश्च वास्तुरत्नः त्रिधोदितः ।। ( समराङ्गणसूत्रधार-१३.१ ) अपराजितपृच्छा (५७) में वास्तुपद के ग्यारह भेद वर्णित हैं—स्वस्तिक, पुष्पक, नन्द, षोडशाक्ष, कुलतिलक, सुभद्र, मरीचिगण, भद्रक, कामद, भद्र एवं सर्वतोभद्र— स्वस्तिकं पुष्पकं नन्दं षोडशाक्षं चतुर्थकम्। पञ्चमं कुलतिलकञ्च सुभद्रं षष्ठमेव च ।।१।। सप्तमो मरीचिगणो भद्रकं स्यात्तथाष्टमम्। नवमं कामदं प्रोक्तं दशमं भद्रमुच्यते ।।२।। सर्वतोभद्रनामाख्यमत ऊर्ध्वं न कारयेत्। वास्तुन्येकादशैव स्युः प्रोक्तानि परमेश्वरैः ।।३।। वास्तुपदों के देवता ( ३४-४० ) मयमत में वर्णित वास्तुपद के देवों की सूची मत्स्यपुराण (२५३.२४-३३) में दी गई सूची से पृथक् है। मत्स्यपुराण के अनुसार ईशान कोण से प्रारम्भ कर देवों की सूची इस प्रकार है—शिखी, पर्जन्य, जयन्त, इन्द्र, सूर्य, सत्य, भृश, अन्तरिक्ष,

सप्तमोऽध्यायः 卐 पदविन्यासः ४७ वायु, पूषा, वितथ, बृहत्क्षत ( कुछ ग्रन्थों में—गृहक्षत ), यम, गन्धर्व, भृङ्गराज, मृग, पितृगण, दौवारिक, सुग्रीव, पुष्पदन्त, जलाधिप ( वरुण ), असुर, शोष, पाप, रोग, अहि, मुख्य, भल्लाट, सोम, सर्प, अदिति एवं दिति। केन्द्रस्थ ब्रह्मा के चारो ओर कोणों में आप, सावित्र, जय एवं रुद्र तथा मध्य में अर्यमा, सविता, विवस्वान्, विबुधाधिप ( इन्द्र ), मित्र, राजयक्ष्मा, पृथिवीधर एवं आपवत्स देवता स्थित रहते हैं। प्रायः वास्तु-ग्रन्थों में देवों का यही क्रम एवं संज्ञा प्रचलित है।

अथाष्टमोऽध्यायः ( बलिकर्म ) देवानां स्वपदस्थानां बलिकर्म विधीयते । सामान्याहत्यमार्गेण ब्रह्मादीनां यथाक्रमम् ॥१॥ अपने-अपने वास्तुपद में स्थित वास्तुदेवों का बलिकर्म ( पूजा एवं नैवेद्य ) होना चाहिये। इनका बलिकर्म सामान्य आहत्य मार्ग ( प्रत्येक देवता के अनुसार पूजा एवं नैवेद्य ) से करना चाहिये। बलिकर्म में ब्रह्मा आदि देवों की क्रमानुसार पूजा करनी चाहिये।।१।। ✵ आहत्यबलिः ✵ गन्धमाल्यैश्च धूपेन पयसा मधुसर्पिषा । पायसौदनलाजैश्च ब्रह्मस्थानं समर्चयेत् ॥२॥ पूजन-सामग्री एवं नैवेद्य—बलिकर्म में देवों को इस प्रकार क्रम देना चाहिये— ब्रह्मस्थान की पूजा गन्ध, माल्य, धूप, दूध, मधु, घी, खीर एवं धान के लावा से करनी चाहिये।।२।। आर्यके फलभक्ष्यं स्यान्माषान्नं च तिलानि च। विवस्वति विनिक्षिप्तं दधि दूर्वा च मित्रके ॥३॥ ( इसके पश्चात् ब्रह्मा के चारो ओर स्थित देवों की पूजा होती है।) आर्यक का बलिकर्म फलनिर्मित भोज्य पदार्थ, उड़द एवं तिल से करना चाहिये। विवस्वान् को दधि एवं मित्रक को दूर्वा प्रदान करना चाहिये।।३।। महीधरे भवेद् दुग्धमेवमन्तर्बलिः स्मृतः । पर्जन्यस्याज्यमैन्द्रस्य नवनीतं सपुष्पकम् ॥४॥ महीधर को दूध प्रदान करना चाहिये। इस प्रकार वास्तुमण्डल के भीतर केन्द्रस्थ देवों का बलिकर्म सम्पन्न होता है ( इसके पश्चात् बाह्य कोष्ठों के देवों का बलिकर्म होता है )। पर्जन्य को घी एवं ऐन्द्र को पुष्पसहित नवनीत प्रदान करना चाहिये।।४।। इन्द्रे कोष्ठं च पुष्पं च मधु कन्दाश्च भास्करे । सत्यके मधुकं दद्याद् भृशाय नवनीतकम् ॥५॥

अष्टमोऽध्यायः 卐 बलिकर्म ४९ इन्द्र को कोष्ठ एवं पुष्प, सूर्य को कन्द एवं मधु, सत्यक को मधु तथा भृश को नवनीत प्रदान करना चाहिये ।।५।। माषं रजनिचूर्णं च गगनस्य बलिं ददेत् । दुग्धाज्यं तगरं वह्नेः शिम्बान्नं पूष्णि पायसम् ।।६।। आकाश को उड़द एवं हरताल, अग्नि को दूध, घी एवं तगरपुष्प तथा पूषा को शिम्बान्न ( तरकारी ) एवं पायस प्रदान करना चाहिये ।।६।। कङ्क्वन्नं वितथे शीधु राक्षसे बलिरिष्यते । शिम्बान्नं कृसरं याम्ये गन्धर्वेऽखिलगन्धकम् ।।७।। वितथ को पका हुआ कङ्गु, राक्षस को मदिरा, यम को तरकारी एवं खिचड़ी तथा गन्धर्व को सुगन्धि बलिरूप में प्रदान करना चाहिये ।।७।। भृङ्गराजेऽब्धिमत्स्यः स्यान्मृषे मत्स्योदनं विदुः । निर्ऋतौ तैलपिण्याकं बीजं दौवारिके बलिः ।।८।। भृङ्गराज को समुद्र की मछली, मृष को मछली एवं भात, निर्ऋति को तेल में पका पिण्याक ( पिण्डी या मुठिया ) तथा दौवारिक को बीज की बलि देनी चाहिये ।।८।। सुग्रीवे मोदकं पुष्पदन्तके पुष्पतोयकम् । वरुणे पायसं धान्यं शोणितेनासुरे बलिः ।।९।। सुग्रीव को लड्डू, पुष्पदन्त को पुष्प एवं जल, वरुण को दूध एवं धान्य ( अन्न ) तथा असुर को रक्त प्रदान करना चाहिये ।।९।। सतिलं तण्डुलं शोषे रोगे स्याच्छुष्कमत्स्यकम् । स्विन्नं हारिद्रकं वायौ नागे मद्यं च लाजकम् ।।१०।। शोष को तिलयुक्त चावल, रोग को सूखी मछली, वायु को चर्बी एवं हरिद्रा ( हल्दी ) तथा नाग को मद्य एवं लावा प्रदान करना चाहिये ।।१०।। धान्यचूर्णं हि मुख्यस्य दधि सर्पिश्च सम्मतम् । गुलौदनं तु भल्लाटे सोमे दुग्धौदनं ददेत् ।।११।। मुख्य को अन्न का चूर्ण ( आटा ), दधि एवं घृत, भल्लाट को गुड़ में पका भात एवं सोम को दूध-भात प्रदान करना चाहिये ।।११।। शुष्कमांसं मृगे दद्याद् देवमातरि मोदकम् । उदितौ तिलभक्ष्येण क्षीरान्नं सर्पिरीशके ।।१२।। मृग को शुष्क मांस, देवमाता अदिति को लड्डू, उदिति को तिल-भोज्य एवं ईश मय०-४

५० मयमतम् को दूध में पका अन्न एवं घृत को बलिरूप में चढ़ाना चाहिये ।।१२।। लाजं धान्यं सविन्द्रस्य साविन्द्रे गन्धतोयकम् । बस्तमेदस्तथा मुद्गचूर्णमिन्द्रेन्द्रराजयोः ॥१३॥ लावा एवं धान्य सविन्द्र को, सुगन्धित जल साविन्द्र को, बकरी का मेद एवं मूँग का चूर्ण इन्द्र एवं इन्द्रराज को प्रदान करना चाहिये ।।१३।। रुद्रे रुद्रजये मांसं स्विन्नमापापवत्सयोः । कुमुदं मत्स्यमांसं च शङ्ककच्छपमांसकम् ॥१४॥ रुद्र एवं रुद्रजय को मांस तथा चर्बी, आप एवं आपवत्स को कुमुदपुष्प, मछली का मांस, शङ्कक ( शङ्ख के मध्य स्थित मांस ) एवं कछुये का मांस प्रदान करना चाहिये ।।१४।। मद्यमाज्यं चरक्यास्तु विदार्या लवणो बलिः । पूतनायास्तिलं पिष्टमन्याया मुद्गसारकम् ।।१५।। चरकी को मद्य एवं घृत, विदारी को लवण, पूतना को तिल एवं पिष्ट तथा पाप- राक्षसी को मूँग का सत्त्व प्रदान करना चाहिये ।।१५।। ✺ साधारणबलिः ✺ साधारणबलिः शुद्धभोजनं सघृतं दधि । सर्वेषामपि देवानां गन्धादीनि ददेत् क्रमात् ॥१६॥ सामान्य रूप से सभी देवों को प्रदान की जाने वाली बलि इस प्रकार है— साधारणं बलि घृत के सहित शुद्ध भोजन एवं दधि है। सभी देवों को क्रमशः गन्ध आदि प्रदान करना चाहिये ।।१६।। कन्यका वाऽथ वेश्या वा बलिधारणयोग्यकाः । अङ्गन्यासकरन्यासैः पूतचेता यथाक्रमम् ।।१७।। कन्या या वेश्या को बलि-पदार्थ धारण करने योग्य माना गया है। इन्हें अङ्गन्यास एवं करन्यास द्वारा पवित्र मन ( एवं शरीर ) वाली बनना चाहिये ।।१७।। ओङ्कारादिनमोऽन्तेन स्वस्वनामाभिधाय च । दत्वा पूर्वं जलं पश्चात् साधारणबलिं ददेत् ॥१८॥ वास्तुदेवों का क्रमानुसार नाम लेना चाहिये। उनके नाम से पूर्व 'ॐ' एवं नाम के पश्चात् 'नमः' लगाना चाहिये। उन्हें प्रथमतः जल एवं उसके पश्चात् साधारण बलि देनी चाहिये ।।१८।।

अष्टमोऽध्यायः बलिकर्म ५१ तत्तद्योग्यबलिं पश्चाद् देयं तोयं तथा बुधैः । ग्रामादीनां तु मण्डूकपदे परमशायिके ॥१९॥ इसके पश्चात् उनको विशिष्ट बलि प्रदान कर पीछे जल प्रदान करना चाहिये। विद्वानों के अनुसार ग्रामादि में मण्डूक वास्तुपद एवं परमशायिक वास्तुपद में भी बलि प्रदान करना चाहिये॥१९॥ सन्तर्प्य देवता ह्येवं पूर्वोक्तविधिना क्रमात् । विसर्जयेत्ततो देवान् विन्यासार्थं तु मन्त्रवत् ॥२०॥ इस प्रकार पूर्व में कही गयी विधि से देवों को उनके क्रम के अनुसार तृप्त करके उन्हें विधिपूर्वक विसर्जित करना चाहिये, जिससे वास्तुक्षेत्र का निर्माण करने के लिये विन्यास (भवननिर्माण की योजना) किया जा सके॥२०॥ ब्रह्माणं बाह्यदेवांश्च तत्तदुक्तपदे न्यसेत् । देवालयविधानार्थं द्वारार्थं ते प्रकीर्तिताः ॥२१॥ ब्रह्मा एवं बाह्य देवों को उनके-उनके स्थानों पर रखना चाहिये, जिससे देवालय एवं द्वार का विधान उनको ध्यान में रखते हुये किया जा सके॥२१॥ शेषांश्च निष्पदाः सर्वे रक्षार्थं तु निवेशिताः । एवं ग्रामादिषु प्रोक्तं रहस्यमिदमीरितम् ॥२२॥ पद से रहित शेष सभी देवों को वास्तु की रक्षा के लिये स्थान देना चाहिये। इसी विधि से ग्रामादि में भी देवों का विन्यास करना चाहिये। इस प्रकार वास्तु-पदविन्यास एवं वास्तुदेवों के पूजन के रहस्य का वर्णन किया गया है॥२२॥ कृतोपवासः स्थपतिः प्रभाते विशुद्धदेहोऽविकलं गृहीत्वा । विशेषसामान्यबलिं सुराणां यथोक्तनीत्या विदधीत सम्यक् ॥२३॥ इति मयमते वास्तुशास्त्रे बलिकर्मविधानो नामाष्टमोऽध्यायः प्रातःकाल से उपवास करते हुये स्थपति विशुद्ध शरीर एवं शान्त मन से वास्तु देवों की विशेष एवं सामान्य बलि को लेकर पूर्ववर्णित रीति से भली-भाँति पूजा करे एवं बलि प्रदान करे॥२३॥

अथ नवमोऽध्यायः ( ग्रामविन्यासः ) ग्रामादीनां मानं विन्यासं चापि वक्ष्यते विधिना। ग्रामयोजना—अब ग्राम आदि का नियमानुसार प्रमाण एवं विन्यास ( निर्माण- योजना ) का वर्णन किया जा रहा है। ✵ पुनर्मानोपकरणम्दण्डानां पञ्चशतं क्रोशं तद्द्विगुणमर्धगव्यूतम् ॥१॥ पुनः प्रमाण-चर्चा— पाँच सौ दण्डों का एक क्रोश एवं उसके दुगने ( दो क्रोश ) का एक अर्धगव्यूत मान होता है॥१॥ गव्यूतं तद्द्विगुणं ह्यष्टसहस्रं तु योजनं विद्यात्। अष्टधनुश्चतुरस्रा काकणिका तच्चतुर्गुणं माषम् ॥२॥ एक अर्धगव्यूत का दुगुना एक गव्यूत होता है। आठ हजार दण्ड का एक योजन होता है। आठ धनु ( दण्ड ) का चौकोर माप काकणिका एवं उसका चौगुना माप माष कहलाता है॥२॥ माषचतुर्वर्तनकं तत्पञ्चगुणं हि वाटिका कथिता। वाटिकया युगगुणिता ग्रामकुटुम्बावनिः श्रेष्ठाः ॥३॥ माष का चार गुना वर्तनक एवं पाँच गुना वाटिकासंज्ञक माप होता है। वाटिका का चार गुना स्थान ग्राम में एक परिवार के लिये उत्तम होता है॥३॥ एवं भूतगतमानं दण्डैस्तेषां तु वक्ष्यते मानम्। इस प्रकार दण्डमाप के द्वारा भूमि का मान होता है। उनका मान ( इस प्रकार ) कहा जा रहा है। ✵ ग्रामादिमानम्ग्रामस्य शतसहस्रैर्दण्डैः पर्यन्तमानमिदमुक्तम् ॥४॥ ग्रामादि का प्रमाण—( सबसे बड़े ) ग्राम का मान सौ हजार दण्ड कहा गया है॥४॥

नवमोऽध्यायः 卐 ग्रामविन्यासः ५३ विंशतिसहस्रदण्डात्तत्समवृद्ध्या तु पञ्चमानं स्यात् । ग्रामे विंशतिभागे कुटुम्बभूमिस्तदेकभागेन ॥५॥ बीस हजार दण्ड से प्रारम्भ कर सम संख्या में मानवृद्धि करते हुये ग्रामों के पाँच प्रकार के प्रमाण होते हैं। ग्राम के बीस भाग में एक भाग एक कुटुम्ब की भूमि होती है।।५।। दण्डैः पञ्चशतैर्वृद्धीनं ग्रामस्य मानमिदम् । तस्मात् पञ्चशतर्व्द्ध्या यावद्विंशत्सहस्रदण्डान्तम् ॥६॥ हीन ( सबसे छोटे ) ग्राम का मान पाँच सौ दण्ड का होता है। इससे प्रारम्भ कर पाँच सौ दण्ड बढ़ाते हुये बीस हजार दण्ड तक मान प्राप्त करना चाहिये।।६।। प्रोक्तं चत्वारिंशद्भेदं ग्रामस्य मानमिदम् । द्विसहस्रदण्डमानं सार्धसहस्रं सहस्रदण्डं च ॥७॥ ग्राम के चालीस भेद होते हैं। यह ग्राम का मान है। ( चौड़ाई में ) दो हजार दण्ड, एक हजार पाँच सौ दण्ड तथा हजार दण्ड ( ग्राम का मान है )।।७।। नवशतमथ सप्तशतं पञ्चशतं त्रिशतमिति च विस्तारम् । नगरस्य सहस्रादिद्विसहस्रान्तं च दण्डमानं स्यात् ॥८॥ नौ सौ, सात सौ, पाँच सौ एवं तीन सौ ( ग्राम का ) विस्तार होता है। नगर का दण्डमान एक हजार दण्ड से प्रारम्भ कर दो हजार दण्डपर्यन्त होता है।।८।। नगरस्याष्टसहस्रैर्दण्डैः पर्यन्तमानमिदम् । द्विद्विसहस्रक्षयतो द्विसहस्रान्तं चतुर्विधं मानम् ॥९॥ ( सबसे बड़े ) नगर का मान आठ हजार दण्ड होता है। दो-दो हजार दण्ड कम करते हुये नगर के चार प्रकार के मान प्राप्त होते हैं।।९।। ग्रामः खेटः खर्वटमथ दुर्गं नगरमिति च पञ्चविधम् । दण्डैस्तेषां मानं वक्ष्येऽहं त्रित्रिभेदभिन्नानाम् ॥१०॥ ग्राम, खेट, खर्वट, दुर्ग एवं नगर—ये पाँच प्रकार के ( वसति-विन्यास ) होते हैं। अब मैं ( मय ऋषि ) दण्ड के द्वारा प्रत्येक के तीन-तीन भेद कहता हूँ।।१०।। चतुरधिकषष्टिदण्डो ग्रामः स्याद्धीनहीनमिति कथितः । ग्रामस्य मध्यमस्य द्विगुणं त्रिगुणं तथोत्तमं प्रोक्तम् ॥११॥ छोटे में भी सबसे छोटा ग्राम चौंसठ दण्ड होता है। मध्यम ग्राम उसका दुगुना एवं उत्तम तीन गुना होता है।।११।।

५४ मयमतम् षट्पञ्चाशद्द्विशतं हीनं खेटं सविंशति त्रिशतम् । मध्यममुत्तममेवं सचतुरशीति त्रिशतदण्डम् ॥१२॥ छोटे खेट का माप दो सौ छप्पन, मध्यम खेट का तीन सौ बीस तथा उत्तम खेट का माप तीन सौ चौरासी दण्ड होता है।।१२।। अष्टौ चत्वारिंशच्चतुःशतं द्वादशं च पञ्चशतम् । षट्सप्ततिपञ्चशतं हीनं मध्योत्तमं च खर्वटकम् ॥१३॥ छोटे खर्वट का माप चार सौ अड़तालीस, मध्यम खर्वट का माप पाँच सौ बारह तथा उत्तम खर्वट का माप पाँच सौ छिहत्तर दण्ड कहा गया है।।१३।। चत्वारिंशत्षट्शतमधमं दुर्गं चतुःसप्तशतदण्डम् । मध्यममुत्तमदुर्गं सप्तशतं षष्टिरष्टौ हि ॥१४॥ कनिष्ठ दुर्ग छः सौ चालीस दण्ड, मध्यम दुर्ग सात सौ चार दण्ड एवं उत्तम दुर्ग सात सौ अड़सठ दण्ड का होता है।।१४।। द्वात्रिंशदष्टशतकं नगरं षण्णवत्यष्टशतदण्डम् । षष्टिर्नवशतमधमं मध्यममुत्कृष्टमिति यथासंख्यम् ॥१५॥ कनिष्ठ नगर आठ सौ बत्तीस दण्ड, मध्यम नगर आठ सौ छियानबे दण्ड तथा उत्तम नगर नौ सौ साठ दण्ड माप का होता है।।१५।। षोडशदण्डविवृद्ध्या प्रत्येकं नवविधं भवति । द्विगुणं त्रिपादमर्धं पादं तेषां मुखायतं विपुलात् ॥१६॥ सोलह दण्ड की वृद्धि करते हुये प्रत्येक के नौ भेद होते हैं। इनकी लम्बाई चौड़ाई की दुगुनी, तीन चौथाई, आधी या चौथाई अधिक होती है।।१६।। व्यासषडष्टांशैकं चतुरस्रं वा यथेष्टं स्यात् । तस्मिन् विपुलायामे दण्डैरोजैः प्रमाणमात्तव्यम् ॥१७॥ अथवा छः या आठ भाग अधिक हो सकता है। इच्छानुसार इसकी लम्बाई-चौड़ाई समान भी हो सकती है। इनकी लम्बाई एवं चौड़ाई विषम दण्डसंख्या में होनी चाहिये।।१७।। शेषं वाटधरार्थं ग्रामादिषु सर्ववस्तुषु च । शेष का सम्बन्ध उस क्षेत्र से होता है, जिस पर निर्माणकार्य नहीं हुआ रहता। इस विधि का प्रयोग सभी ग्राम आदि वास्तुक्षेत्रों पर होता है। ✺ आयादि ✺ आयादिसम्पदर्थं वृद्धिं हानिं च यष्टिभिः कुर्यात् ॥१८॥