मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टमोऽध्यायः 卐 बलिकर्म ४९ इन्द्र को कोष्ठ एवं पुष्प, सूर्य को कन्द एवं मधु, सत्यक को मधु तथा भृश को नवनीत प्रदान करना चाहिये ।।५।। माषं रजनिचूर्णं च गगनस्य बलिं ददेत् । दुग्धाज्यं तगरं वह्नेः शिम्बान्नं पूष्णि पायसम् ।।६।। आकाश को उड़द एवं हरताल, अग्नि को दूध, घी एवं तगरपुष्प तथा पूषा को शिम्बान्न ( तरकारी ) एवं पायस प्रदान करना चाहिये ।।६।। कङ्क्वन्नं वितथे शीधु राक्षसे बलिरिष्यते । शिम्बान्नं कृसरं याम्ये गन्धर्वेऽखिलगन्धकम् ।।७।। वितथ को पका हुआ कङ्गु, राक्षस को मदिरा, यम को तरकारी एवं खिचड़ी तथा गन्धर्व को सुगन्धि बलिरूप में प्रदान करना चाहिये ।।७।। भृङ्गराजेऽब्धिमत्स्यः स्यान्मृषे मत्स्योदनं विदुः । निर्ऋतौ तैलपिण्याकं बीजं दौवारिके बलिः ।।८।। भृङ्गराज को समुद्र की मछली, मृष को मछली एवं भात, निर्ऋति को तेल में पका पिण्याक ( पिण्डी या मुठिया ) तथा दौवारिक को बीज की बलि देनी चाहिये ।।८।। सुग्रीवे मोदकं पुष्पदन्तके पुष्पतोयकम् । वरुणे पायसं धान्यं शोणितेनासुरे बलिः ।।९।। सुग्रीव को लड्डू, पुष्पदन्त को पुष्प एवं जल, वरुण को दूध एवं धान्य ( अन्न ) तथा असुर को रक्त प्रदान करना चाहिये ।।९।। सतिलं तण्डुलं शोषे रोगे स्याच्छुष्कमत्स्यकम् । स्विन्नं हारिद्रकं वायौ नागे मद्यं च लाजकम् ।।१०।। शोष को तिलयुक्त चावल, रोग को सूखी मछली, वायु को चर्बी एवं हरिद्रा ( हल्दी ) तथा नाग को मद्य एवं लावा प्रदान करना चाहिये ।।१०।। धान्यचूर्णं हि मुख्यस्य दधि सर्पिश्च सम्मतम् । गुलौदनं तु भल्लाटे सोमे दुग्धौदनं ददेत् ।।११।। मुख्य को अन्न का चूर्ण ( आटा ), दधि एवं घृत, भल्लाट को गुड़ में पका भात एवं सोम को दूध-भात प्रदान करना चाहिये ।।११।। शुष्कमांसं मृगे दद्याद् देवमातरि मोदकम् । उदितौ तिलभक्ष्येण क्षीरान्नं सर्पिरीशके ।।१२।। मृग को शुष्क मांस, देवमाता अदिति को लड्डू, उदिति को तिल-भोज्य एवं ईश मय०-४