मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथाष्टमोऽध्यायः ( बलिकर्म ) देवानां स्वपदस्थानां बलिकर्म विधीयते । सामान्याहत्यमार्गेण ब्रह्मादीनां यथाक्रमम् ॥१॥ अपने-अपने वास्तुपद में स्थित वास्तुदेवों का बलिकर्म ( पूजा एवं नैवेद्य ) होना चाहिये। इनका बलिकर्म सामान्य आहत्य मार्ग ( प्रत्येक देवता के अनुसार पूजा एवं नैवेद्य ) से करना चाहिये। बलिकर्म में ब्रह्मा आदि देवों की क्रमानुसार पूजा करनी चाहिये।।१।। ✵ आहत्यबलिः ✵ गन्धमाल्यैश्च धूपेन पयसा मधुसर्पिषा । पायसौदनलाजैश्च ब्रह्मस्थानं समर्चयेत् ॥२॥ पूजन-सामग्री एवं नैवेद्य—बलिकर्म में देवों को इस प्रकार क्रम देना चाहिये— ब्रह्मस्थान की पूजा गन्ध, माल्य, धूप, दूध, मधु, घी, खीर एवं धान के लावा से करनी चाहिये।।२।। आर्यके फलभक्ष्यं स्यान्माषान्नं च तिलानि च। विवस्वति विनिक्षिप्तं दधि दूर्वा च मित्रके ॥३॥ ( इसके पश्चात् ब्रह्मा के चारो ओर स्थित देवों की पूजा होती है।) आर्यक का बलिकर्म फलनिर्मित भोज्य पदार्थ, उड़द एवं तिल से करना चाहिये। विवस्वान् को दधि एवं मित्रक को दूर्वा प्रदान करना चाहिये।।३।। महीधरे भवेद् दुग्धमेवमन्तर्बलिः स्मृतः । पर्जन्यस्याज्यमैन्द्रस्य नवनीतं सपुष्पकम् ॥४॥ महीधर को दूध प्रदान करना चाहिये। इस प्रकार वास्तुमण्डल के भीतर केन्द्रस्थ देवों का बलिकर्म सम्पन्न होता है ( इसके पश्चात् बाह्य कोष्ठों के देवों का बलिकर्म होता है )। पर्जन्य को घी एवं ऐन्द्र को पुष्पसहित नवनीत प्रदान करना चाहिये।।४।। इन्द्रे कोष्ठं च पुष्पं च मधु कन्दाश्च भास्करे । सत्यके मधुकं दद्याद् भृशाय नवनीतकम् ॥५॥