भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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५४ मयमतम् षट्पञ्चाशद्द्विशतं हीनं खेटं सविंशति त्रिशतम् । मध्यममुत्तममेवं सचतुरशीति त्रिशतदण्डम् ॥१२॥ छोटे खेट का माप दो सौ छप्पन, मध्यम खेट का तीन सौ बीस तथा उत्तम खेट का माप तीन सौ चौरासी दण्ड होता है।।१२।। अष्टौ चत्वारिंशच्चतुःशतं द्वादशं च पञ्चशतम् । षट्सप्ततिपञ्चशतं हीनं मध्योत्तमं च खर्वटकम् ॥१३॥ छोटे खर्वट का माप चार सौ अड़तालीस, मध्यम खर्वट का माप पाँच सौ बारह तथा उत्तम खर्वट का माप पाँच सौ छिहत्तर दण्ड कहा गया है।।१३।। चत्वारिंशत्षट्शतमधमं दुर्गं चतुःसप्तशतदण्डम् । मध्यममुत्तमदुर्गं सप्तशतं षष्टिरष्टौ हि ॥१४॥ कनिष्ठ दुर्ग छः सौ चालीस दण्ड, मध्यम दुर्ग सात सौ चार दण्ड एवं उत्तम दुर्ग सात सौ अड़सठ दण्ड का होता है।।१४।। द्वात्रिंशदष्टशतकं नगरं षण्णवत्यष्टशतदण्डम् । षष्टिर्नवशतमधमं मध्यममुत्कृष्टमिति यथासंख्यम् ॥१५॥ कनिष्ठ नगर आठ सौ बत्तीस दण्ड, मध्यम नगर आठ सौ छियानबे दण्ड तथा उत्तम नगर नौ सौ साठ दण्ड माप का होता है।।१५।। षोडशदण्डविवृद्ध्या प्रत्येकं नवविधं भवति । द्विगुणं त्रिपादमर्धं पादं तेषां मुखायतं विपुलात् ॥१६॥ सोलह दण्ड की वृद्धि करते हुये प्रत्येक के नौ भेद होते हैं। इनकी लम्बाई चौड़ाई की दुगुनी, तीन चौथाई, आधी या चौथाई अधिक होती है।।१६।। व्यासषडष्टांशैकं चतुरस्रं वा यथेष्टं स्यात् । तस्मिन् विपुलायामे दण्डैरोजैः प्रमाणमात्तव्यम् ॥१७॥ अथवा छः या आठ भाग अधिक हो सकता है। इच्छानुसार इसकी लम्बाई-चौड़ाई समान भी हो सकती है। इनकी लम्बाई एवं चौड़ाई विषम दण्डसंख्या में होनी चाहिये।।१७।। शेषं वाटधरार्थं ग्रामादिषु सर्ववस्तुषु च । शेष का सम्बन्ध उस क्षेत्र से होता है, जिस पर निर्माणकार्य नहीं हुआ रहता। इस विधि का प्रयोग सभी ग्राम आदि वास्तुक्षेत्रों पर होता है। ✺ आयादि ✺ आयादिसम्पदर्थं वृद्धिं हानिं च यष्टिभिः कुर्यात् ॥१८॥