मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनवमोऽध्यायः 卐 ग्रामविन्यासः ५३ विंशतिसहस्रदण्डात्तत्समवृद्ध्या तु पञ्चमानं स्यात् । ग्रामे विंशतिभागे कुटुम्बभूमिस्तदेकभागेन ॥५॥ बीस हजार दण्ड से प्रारम्भ कर सम संख्या में मानवृद्धि करते हुये ग्रामों के पाँच प्रकार के प्रमाण होते हैं। ग्राम के बीस भाग में एक भाग एक कुटुम्ब की भूमि होती है।।५।। दण्डैः पञ्चशतैर्वृद्धीनं ग्रामस्य मानमिदम् । तस्मात् पञ्चशतर्व्द्ध्या यावद्विंशत्सहस्रदण्डान्तम् ॥६॥ हीन ( सबसे छोटे ) ग्राम का मान पाँच सौ दण्ड का होता है। इससे प्रारम्भ कर पाँच सौ दण्ड बढ़ाते हुये बीस हजार दण्ड तक मान प्राप्त करना चाहिये।।६।। प्रोक्तं चत्वारिंशद्भेदं ग्रामस्य मानमिदम् । द्विसहस्रदण्डमानं सार्धसहस्रं सहस्रदण्डं च ॥७॥ ग्राम के चालीस भेद होते हैं। यह ग्राम का मान है। ( चौड़ाई में ) दो हजार दण्ड, एक हजार पाँच सौ दण्ड तथा हजार दण्ड ( ग्राम का मान है )।।७।। नवशतमथ सप्तशतं पञ्चशतं त्रिशतमिति च विस्तारम् । नगरस्य सहस्रादिद्विसहस्रान्तं च दण्डमानं स्यात् ॥८॥ नौ सौ, सात सौ, पाँच सौ एवं तीन सौ ( ग्राम का ) विस्तार होता है। नगर का दण्डमान एक हजार दण्ड से प्रारम्भ कर दो हजार दण्डपर्यन्त होता है।।८।। नगरस्याष्टसहस्रैर्दण्डैः पर्यन्तमानमिदम् । द्विद्विसहस्रक्षयतो द्विसहस्रान्तं चतुर्विधं मानम् ॥९॥ ( सबसे बड़े ) नगर का मान आठ हजार दण्ड होता है। दो-दो हजार दण्ड कम करते हुये नगर के चार प्रकार के मान प्राप्त होते हैं।।९।। ग्रामः खेटः खर्वटमथ दुर्गं नगरमिति च पञ्चविधम् । दण्डैस्तेषां मानं वक्ष्येऽहं त्रित्रिभेदभिन्नानाम् ॥१०॥ ग्राम, खेट, खर्वट, दुर्ग एवं नगर—ये पाँच प्रकार के ( वसति-विन्यास ) होते हैं। अब मैं ( मय ऋषि ) दण्ड के द्वारा प्रत्येक के तीन-तीन भेद कहता हूँ।।१०।। चतुरधिकषष्टिदण्डो ग्रामः स्याद्धीनहीनमिति कथितः । ग्रामस्य मध्यमस्य द्विगुणं त्रिगुणं तथोत्तमं प्रोक्तम् ॥११॥ छोटे में भी सबसे छोटा ग्राम चौंसठ दण्ड होता है। मध्यम ग्राम उसका दुगुना एवं उत्तम तीन गुना होता है।।११।।