मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ नवमोऽध्यायः ( ग्रामविन्यासः ) ग्रामादीनां मानं विन्यासं चापि वक्ष्यते विधिना। ग्रामयोजना—अब ग्राम आदि का नियमानुसार प्रमाण एवं विन्यास ( निर्माण- योजना ) का वर्णन किया जा रहा है। ✵ पुनर्मानोपकरणम् ✵ दण्डानां पञ्चशतं क्रोशं तद्द्विगुणमर्धगव्यूतम् ॥१॥ पुनः प्रमाण-चर्चा— पाँच सौ दण्डों का एक क्रोश एवं उसके दुगने ( दो क्रोश ) का एक अर्धगव्यूत मान होता है॥१॥ गव्यूतं तद्द्विगुणं ह्यष्टसहस्रं तु योजनं विद्यात्। अष्टधनुश्चतुरस्रा काकणिका तच्चतुर्गुणं माषम् ॥२॥ एक अर्धगव्यूत का दुगुना एक गव्यूत होता है। आठ हजार दण्ड का एक योजन होता है। आठ धनु ( दण्ड ) का चौकोर माप काकणिका एवं उसका चौगुना माप माष कहलाता है॥२॥ माषचतुर्वर्तनकं तत्पञ्चगुणं हि वाटिका कथिता। वाटिकया युगगुणिता ग्रामकुटुम्बावनिः श्रेष्ठाः ॥३॥ माष का चार गुना वर्तनक एवं पाँच गुना वाटिकासंज्ञक माप होता है। वाटिका का चार गुना स्थान ग्राम में एक परिवार के लिये उत्तम होता है॥३॥ एवं भूतगतमानं दण्डैस्तेषां तु वक्ष्यते मानम्। इस प्रकार दण्डमाप के द्वारा भूमि का मान होता है। उनका मान ( इस प्रकार ) कहा जा रहा है। ✵ ग्रामादिमानम् ✵ ग्रामस्य शतसहस्रैर्दण्डैः पर्यन्तमानमिदमुक्तम् ॥४॥ ग्रामादि का प्रमाण—( सबसे बड़े ) ग्राम का मान सौ हजार दण्ड कहा गया है॥४॥