भारतकोश
मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey

मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा

DevanagariHindipublished395 पृष्ठ

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अष्टमोऽध्यायः बलिकर्म ५१ तत्तद्योग्यबलिं पश्चाद् देयं तोयं तथा बुधैः । ग्रामादीनां तु मण्डूकपदे परमशायिके ॥१९॥ इसके पश्चात् उनको विशिष्ट बलि प्रदान कर पीछे जल प्रदान करना चाहिये। विद्वानों के अनुसार ग्रामादि में मण्डूक वास्तुपद एवं परमशायिक वास्तुपद में भी बलि प्रदान करना चाहिये॥१९॥ सन्तर्प्य देवता ह्येवं पूर्वोक्तविधिना क्रमात् । विसर्जयेत्ततो देवान् विन्यासार्थं तु मन्त्रवत् ॥२०॥ इस प्रकार पूर्व में कही गयी विधि से देवों को उनके क्रम के अनुसार तृप्त करके उन्हें विधिपूर्वक विसर्जित करना चाहिये, जिससे वास्तुक्षेत्र का निर्माण करने के लिये विन्यास (भवननिर्माण की योजना) किया जा सके॥२०॥ ब्रह्माणं बाह्यदेवांश्च तत्तदुक्तपदे न्यसेत् । देवालयविधानार्थं द्वारार्थं ते प्रकीर्तिताः ॥२१॥ ब्रह्मा एवं बाह्य देवों को उनके-उनके स्थानों पर रखना चाहिये, जिससे देवालय एवं द्वार का विधान उनको ध्यान में रखते हुये किया जा सके॥२१॥ शेषांश्च निष्पदाः सर्वे रक्षार्थं तु निवेशिताः । एवं ग्रामादिषु प्रोक्तं रहस्यमिदमीरितम् ॥२२॥ पद से रहित शेष सभी देवों को वास्तु की रक्षा के लिये स्थान देना चाहिये। इसी विधि से ग्रामादि में भी देवों का विन्यास करना चाहिये। इस प्रकार वास्तु-पदविन्यास एवं वास्तुदेवों के पूजन के रहस्य का वर्णन किया गया है॥२२॥ कृतोपवासः स्थपतिः प्रभाते विशुद्धदेहोऽविकलं गृहीत्वा । विशेषसामान्यबलिं सुराणां यथोक्तनीत्या विदधीत सम्यक् ॥२३॥ इति मयमते वास्तुशास्त्रे बलिकर्मविधानो नामाष्टमोऽध्यायः प्रातःकाल से उपवास करते हुये स्थपति विशुद्ध शरीर एवं शान्त मन से वास्तु देवों की विशेष एवं सामान्य बलि को लेकर पूर्ववर्णित रीति से भली-भाँति पूजा करे एवं बलि प्रदान करे॥२३॥

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