मयमतम् (मय मुनि प्रणीत वास्तुशास्त्र - डॉ. शैलजा पाण्डेय सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Mayamatam of Maya Muni with Hindi Commentary by Shailaja Pandey
मय मुनि (टीकाकार: डॉ. शैलजा पाण्डेय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनवमोऽध्यायः 卐 ग्रामविन्यासः ५५ आयादि को प्राप्त करने के लिये दण्डों को बढ़ाया-घटाया जा सकता है।।१८।। आयव्ययर्क्षयोन्यायुभिरथ तिथिभिश्च वारैश्च। यजमानवस्तुनामजन्मर्क्षेणाविरोधिकं यत् ॥१९॥ जिस वास्तु का माप आय, व्यय, नक्षत्र, योनि, आयु, तिथि एवं वार के विपरीत न हो एवं न ही यजमान ( गृहस्वामी ) के नाम, जन्मनक्षत्र अथवा स्थान से विपरीत होना चाहिये ( कहने का तात्पर्य यह है कि ग्राम आदि वसतिविन्यास के सभी विचार- णीय बिन्दु गृहस्वामी एवं उसकी भूमि के अनुकूल होने चाहिये ) ।।१९।। तन्मानेन समेतं गृह्णीयात् सर्वसम्पत्तै। व्यासायामसमूहे वसुनिधिगुणिते दिनेशधर्महृते ॥२०॥ सभी प्रकार की सम्पत्तियों की प्राप्ति के लिये वास्तुक्षेत्र को उसके मान समेत ग्रहण करना चाहिये। वास्तुक्षेत्र के चौड़ाई एवं लम्बाई को जोड़ कर आठ से एवं नौ से गुणा करना चाहिये। प्राप्त गुणनफल में क्रमशः बारह एवं दश का भाग देना चाहिये।।२०।। आयव्ययमवशिष्टं रामघ्नेऽष्टापहृच्छेषम् । ध्वजधूमसिंहश्वावृषखरगजकाकाश्च योनिगणाः ॥२१॥ शेष संख्या से क्रमशः आय एवं व्यय का ज्ञान करना चाहिये। ( लम्बाई एवं चौड़ाई के योग में ) तीन से गुणा कर आठ से भाग देने पर जो शेष बचे, उससे योनियों की प्राप्ति होती है। ये योनियाँ ध्वज, धूम, सिंह, श्वान, वृष, खर, गज एवं काक कही गई हैं।।२१।। अष्टौ योनय उदिता ध्वजहरिवृषहस्तिनः शुभदाः । पुनरपि वसुभिर्गुणिते त्रिनवाहृत्या फलं वयः शिष्टम् ॥२२॥ ( उपर्युक्त ) आठ योनियाँ कही गई हैं। इनमें ध्वज, सिंह, वृष एवं गज प्रशस्त हैं। पुनः ( लम्बाई एवं चौड़ाई के योग में ) आठ का गुणा कर सत्ताईस का भाग देने पर भागफल से वय का ज्ञान होता है।।२२।। नक्षत्रं परिणाहे त्रिंशद्ध्याप्ते तिथियमीशहृते । वारं सूर्यमुखं स्याद् बुद्ध्वैवं सर्ववस्तु करणीयम् ॥२३॥ लम्बाई एवं चौड़ाई के योग में तीस का भाग देने पर शेष संख्या से सौर दिनों का ज्ञान होता है। प्रथम वार रविवार होता है। सभी प्रकार के वास्तुओं में इसी प्रकार ज्ञात कर कार्य करना चाहिये।।२३।।